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तू महान बन ! महान बन !!

Posted On: 20 Oct, 2010 में

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आज के परिवेश में हर कोई इतना व्यस्त है कि अपने आस-पास क्या घटित हो रहा है जानने की आवश्यकता ही नहीं समझता कभी-कभी लगता वह मानवता से भी परे होता जा रहा है कुछ सोचने को विवश हुई और अपनी एक अभिलाषा इन शब्दों में व्यक्त कर डाली जो यहाँ प्रस्तुत है ———
तू महान बन महान बन
इतना कि क्षितिज पार गगन !
गिर ना जाऊं कहीं रहूँ अचल सम ,
दर्प शक्ति से न गर्वित होना है ,
तड़पता देखूं जीव कहीं,
गर वक्ष पर लगे शूल तभी,
प्यार दश से निकसित करूँ
औ बहा दूं नेह नीर उन पर !
विजय सुमन का हार पहनूं
हिरदय चक्षु खोल निष्कपटी बन जाऊं
अपरमित प्रेम की निर्झरिणी बहाऊँ
बन जाऊं उनका मसीहा ,
तृषित जग की तमस जोत को
ज्ञान के अंतर्दीप से प्रज्ज्वलित करूँ!
विश्रांत पथिक सा विश्राम पाऊँ !
महान बन तू महान बन
इतना कि क्षितिज पार गगन !

——————***********————-

स्नेह-नीर बरसो उन par

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rahulpriyadarshi के द्वारा
January 7, 2011

आपके उद्गारों को नमन करता हूँ,और निश्चित रूप से अति सुन्दर काव्य रचना.

Amit kr Gupta के द्वारा
November 17, 2010

अलका जी नमस्कार .आपने बिलकुल ही सच कहा की अभी के समय में लोगो के पास समय का अभाव हैं.आज लोग अपने कामो से मतलब रखने लगे हैं. देश में क्या हो रहा हैं कहा क्या हुआ इसको जानने की जरुरत कोई नहीं करता हैं. आज तो लोग लोकतंत्र के महापर्व मतदान के दिन भी वे मतदान करने नहीं जाते हैं. हा अगर सर्कार की आलोचना करने की बात हो तो वे जरुर से जरुर करेंगे .,मतदान के दिन को लोग छुट्टी का दिन समझते हैं.कही आपके इस लेख को पढ़ने के बाद उन लोगो की नींद खुले और वे अपने देश से प्यार करने लगे. हमें अपने जीवन में तरक्की करने चाहिए लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं की हम अपनी मात्रभूमि को भुला दे. आप मेरे लेख पढ़ने के लिए इस add पर जा सकते हैं. http://www.amitkrgupta.jagranjunction.com मुझे आपके शिकायतों और सुझाव का इंतजार रहेगा. अमित कुमार गुप्ता ]हाजीपुर वैशाली बिहार

    Alka Gupta के द्वारा
    November 22, 2010

    अमित जी, आपकी प्रतिक्रिया देर से देखी ,क्षमा प्रार्थी हूँ एक-एक करके आपके लेख पढ़ रहीं हूँ लेकिन  एक लेख में जागरण मंच से अलविदा कहा है पर क्यों समझ नहीं पाई  कृपया बताने का कष्ट करें आपके तो लेख   अच्छे व जानकारी वाले ही हैं  

October 28, 2010

विजय सुमन का हार पहनूं हिरदय चक्षु खोल निष्कपटी बन जाऊं अपरमित प्रेम की निर्झरिणी बहाऊँ बन जाऊं उनका मसीहा , सुन्दर पंक्तियों के लिए हार्दिक बधाई……….

    alkargupta1 के द्वारा
    October 29, 2010

    पियूष जी , आपकी कविताएँ पढ़ने में भी रुचि है बहुत अच्छा लगा। आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार।रचना पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी , धन्यवाद

Ramesh bajpai के द्वारा
October 20, 2010

तृषित जग की तमस जोत को ज्ञान के अंतर्दीप से प्रज्ज्वलित करूँ! आदरणीय अलका जी बहुत खूबसूरत विचार भावो के दीप ज्योति पुंज बन कर बिखरे इसी मंगल कामना के साथ बधाई

    Ramesh bajpai के द्वारा
    October 20, 2010

    कृपया आदरणीया पढ़े

    Alka r Gupta के द्वारा
    October 20, 2010

    रमेश भाई जी, बहुत ही सुंदर पंक्ति के साथ आपने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।आपकी इसी मंगल कामना के साथ मेरे उत्साहवर्धन के लिए आपका बहुत शुक्रिया।रमेश भाई इस समय मैं अमेरिका में हूँ समय का अंतर होने से पढ़ने में विलंब हो जाता हैआपकी बधाई के लिए धन्यवाद 

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
October 20, 2010

अल्‍का जी प्रणाम, आप ने सही ही कहा है कि आज के इस आधुनिक माहौल में मनुष्‍य इतना उल्‍झा हुआ है कि उसे अपने पड़ोसी का नाम तक नहीं मालुम होता है। तो वह दुसरे के दंश के विषय में क्‍या जान पाएं। बहुत ही अच्‍छी पंक्तियां लगी – गर वक्ष पर लगे शूल तभी, प्यार दश से निकसित करूँ पर आज की सच्‍चाई यही है। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

    Alka r Gupta के द्वारा
    October 20, 2010

    दीपक जी ,   अभिवादन ,  आपको पंक्तियाँ अच्छी लगीं जान कर मन को खुशी हुई आज का जीवन ऐसा ही है किसी सीमा तक सही लगता है । प्रतिक्रिया के  लिए आपका धन्यवाद। अलका


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