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उसका...... मृदु अहसास

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क्यों तू खोता है अपने को
इच्छाओं की मृग तृष्णा में?
अंत हीन हैं ये!
न कर पायेगा शमन इनका तू,
पड़ जायेंगी बेड़ियाँ मेरी ही तेरे पाँव में,
कैसे खोल पायेगा फिर तू उन्हें !
ह्रदय तंत्री के झंकृत हुए तार सभी-
संघर्ष रत जग को नहीं जाना क्या तूने?
तो समझ चंचल मन!
मैं….. तो रहता सदा साथ उसके………,
होता है यहाँ हर कोई उसका ही दास,
फटकने भी न देना चाहता कोई मुझे अपने पास ,
पर क्यों भूल जाता यह तू,
मुझसे ही तो होता है उसका अहसास |
हँसना-रोना जीना-मरना,
यही तो है जग में करना,
मुश्किलों के अंगारों पर चलना तुझे|
स्वार्थ छोड़ किंचित परार्थ में रत,
पर-हित में हो जा तू लिप्त|
फलेच्छा त्याग कर्मासक्त हो औ
विश्व बंधुत्व का अलख जगा ,
हो जाए सभी का संगम सर्वत्र |
स्वतः ही खुल जायेंगी पड़ी पैरों में बेड़ियाँ
न भड़केगी मेरी ज्वाला तुझमें
चला जाएगा तू भी शरण में उसकी
और हो जाएगा उसका मृदु अहसास भी
उसका मृदु अहसास भी………!!

———-************———-

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29 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Enzyncscatags के द्वारा
October 24, 2011

हाँ, वास्तव में .

rajkamal के द्वारा
December 2, 2010

काश हम ना कभी बूढ़े हो …हमारी जिंदगी में यह दिन आये कभी ना …

    alkargupta1 के द्वारा
    December 5, 2010

    ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि आपकी यह इच्छा ( ever green  रहने की ) पूर्ण करे !!  

R K KHURANA के द्वारा
November 24, 2010

सुश्री अलका जी, स्वार्थ छोड़ किंचित परार्थ में रत, पर-हित में हो जा तू लिप्त| सुंदर पंक्तियाँ ! अच्छी कविता के लिए बधाई खुराना

    alkargupta1 के द्वारा
    November 28, 2010

    श्री खुराना जी,  देर से उत्तर देने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ आपको पंक्तियाँ अच्छी लगीं और अपनी  प्रतिक्रया दी आपका बहुत बहुत धन्यवाद

rajkamal के द्वारा
November 21, 2010

आदरणीय अलका जी …. अभिवादन !बहुत गुढ़ अर्थ लिए हुए है कविता ….अब ज्यादा क्या कहू डींगे मारते  हुए ….मेरे दिमाग के लेवल से कुछ ज्यादा ही ऊँची है आपकी कविता … इक बेहतरीन कविता के लिए बधाईयाँ

    Alka Gupta के द्वारा
    November 21, 2010

    राजकमलल जी,मैं स्वयं भी नहीं समझ सकी कि कितना गूढ़ अर्थ लिए हुए है बस  मन में विचारों  की उथल-पुथल हई और शब्द रूप में परिणित होकर भावों को आप सबके समक्ष अभिव्यक्त कर  दिया प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत आभार।

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 21, 2010

स्वार्थ छोड़ किंचित परार्थ में रत, पर-हित में हो जा तू लिप्त| फलेच्छा त्याग कर्मासक्त हो औ विश्व बंधुत्व का अलख जगा , हो जाए सभी का संगम सर्वत्र | खूबसूरत पंक्तियाँ………… बधाई……………… देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ …………

    Alka Gupta के द्वारा
    November 21, 2010

    पियूष जी, देरी के लिए क्षमा क्यों बस आपने पंक्तियाँ  पढ़ी और प्रतिक्रिया दी  मुझे अच्छा लगा समय मिलने पर पढ़ते रहें और प्रतिक्रिया देते रहें बस… .

Aakash Tiwaari के द्वारा
November 21, 2010

अलका जी, बहुत ही उच्च कोटि की रचना…..आपको बधाई आकाश तिवारी

    Alka Gupta के द्वारा
    November 21, 2010

    आकाश जी, आपका बहुत बहुत आभार।

nikhil के द्वारा
November 20, 2010

अलका जी सुन्दर भाव लिए सार्थक पंक्तिया… बहुत अच्छी रचना लगी ये…

    Alka Gupta के द्वारा
    November 21, 2010

    आपका बहुत बहुत धन्यवाद

jalal के द्वारा
November 20, 2010

बहुत खूब अलका जी

    Alka Gupta के द्वारा
    November 21, 2010

    बहुत बहुत शुक्रिया

abodhbaalak के द्वारा
November 20, 2010

अलका जी, जीवन में हमारी इच्छाएं कभी भी पूरी हो नहीं सकती, ये तो तृष्णा है, जिसका अंत संभव ही नहीं है, आपकी पंक्तिया जीवन के saar को ujagar karti हैं की हँसना-रोना जीना-मरना, यही तो है जग में करना, sada की bhanti सुन्दर रचना http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    Alka Gupta के द्वारा
    November 21, 2010

    श्री अबोधजी,आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

priyasingh के द्वारा
November 20, 2010

क्यों तू खोता है अपने को इच्छाओं की मृगतृष्णा में …………….. यदि हर कोई आपकी कविता के भाव समझ जाये तो जीवन की कितनी परेशानिया हल हो जाएँगी …………परन्तु जीवन का यह सत्य सबकी समझ में कहा आता है………….उत्तम भावो से सजी उत्कृष्ट कविता …..

    Alka Gupta के द्वारा
    November 21, 2010

    काश सबको समझ में आता…… प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत आभार

HIMANSHU BHATT के द्वारा
November 20, 2010

जीवन की इस मृग तृष्णा में हम एक अंधी दौड़ में दुध रहे है जो .. है उससे अधिक की दौड़ में.. अच्छी कविता.

    Alka Gupta के द्वारा
    November 21, 2010

    आपको कविता अच्छी लगी बहुत बहुत धन्यवाद

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 20, 2010

आदरनीय अलका जी ……………….ह्रदय तंत्री के झंकृत हुए तार सभी- संघर्ष रत जग को नहीं जाना क्या तूने? तो समझ चंचल मन! मैं….. तो रहता सदा साथ उसके………, होता है यहाँ हर कोई उसका ही दास, फटकने भी न देना चाहता कोई मुझे अपने पास , पर क्यों भूल जाता यह तू…………….संघर्ष और कर्म का महत्व देती आपकी ये कविता,बेहद प्रेर्नामयी,धन्यवाद!

    Alka Gupta के द्वारा
    November 21, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

आर.एन. शाही के द्वारा
November 20, 2010

अलका जी, कर्म को प्रेरित करती बहुत ही प्रभावोत्पादक रचना । भावनाओं को महसूस किया जा सकता है । श्रद्धेय वाजपेयी साहब का विश्लेषण पढ़ने का भी मौक़ा मिला । साधुवाद ।

    alkargupta1 के द्वारा
    November 21, 2010

    श्रीशाही जी,अभिवादन श्रद्धेय बाजपेयी जी के विश्लेषण से तो मुझे तो कर्म व फल की गहनता के बारे में ज्ञान मिला।आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूँ ।धन्यवाद

शंभू दयाल वाजपेयी के द्वारा
November 20, 2010

   एक आह्वान करती, एक संदेश देती कविता तो अच्‍छी है अलका जी , लेकिन \’\'फलेच्छा त्याग कर्मासक्त हो\’\'  में कुछ निवेदन की गुंजाइश है। फलेच्‍छा त्‍यागने और कर्मासक्‍त होने वाली दोनों बातें मुझे गीता के संदेशानुरूप नहीं लगतीं। फल की इच्‍छा न करने की बात है,फल के प्रति निरपेक्ष  रहने की बात त्‍यागा तो उसे जाता है जो अपना है। फल न अपना है न अपने वश में है इस लिए \’\’ माफलेषु कदाचन\’\’ है। आसक्ति भी केवल भक्ति की, केवल ईश्‍वर की ही करणीय है,  अन्‍य कोई नहीं , कर्म की भी नहीं । अन्‍य सभी आसक्तियां बांधने वाली हैं। फिर कर्मासक्ति में \’ \’ किमकर्मकिमअकर्मकवयोप्‍यत्र मोहिता:\’\’ का खतरा है। यानी क्‍या कर्म है और कया अकर्म यह जाग्रत विवेक होना । और अगर क्‍या कर्म और क्‍या अकर्म है  इस विवेक बिंदु तक पहुंच गए तो आसक्ति  की जरूरत ही नहीं रह जाएगी। स्‍वाभाविक रुचि रहेगी। यानी फल और कर्म दोनों के प्रति निरपेक्ष-सम रहना है। हमें योगनिष्ठ होकर कर्म करना है। और योग:कर्मषुकौशलम् है।

    Alka Gupta के द्वारा
    November 21, 2010

    श्री बाजपेयीजी, अभिवादन। कृपया आप जैसे वरिष्ठ व अनुभवी लेखक निवेदन  न करके पूर्ण अ्धिकार से प्रतिक्रिया दें तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा.।  बस मन में उठे विचारों की छोटी सी अभिव्यक्ति थी मैने गीता का गहन अध्ययन नहीं किया आपकी प्रतिक्रिया  से बहुत  ज्ञान मिला कर्म और फल के बारे में        आपका बहुत बहुत धन्यवाद। 

nishamittal के द्वारा
November 20, 2010

कविता के माध्यम से बहुत सुन्दर रूप में प्रस्तुत सन्देश.वास्तव में इच्छाएँ अनंत हैं हम इस मृगतृष्णा में भागते रहते हैं तभी तो आप देखिये अरबों रूपये के घोटाले कर देश को लूट बर्बादी के कगार पर पहुंचाने वाले ये नहीं सोच पाते कि सब यहीं रहेगा खानी भी रोटी है, पैसा नहीं.काश !ये सच्चाई समझ सकें हम.ये मृदु अहसास सब को हो इन्ही कामनाओं के साथ

    Alka Gupta के द्वारा
    November 21, 2010

    निशाजी,प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत आभार अगर ये लोग यह समझ  लें  कि इस मित्थ्या जगत में कुछ भी अपना नहीं है यहाँ तक कि तन भी अपना  नहीं  है फिर तो समाज व देश की तस्वीर ही बदल जाए काश ऐसा हो पाता….


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