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बढ़ते वृद्धाश्रम और जीवन मूल्य !

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बात करीब चार मास पूर्व की है एक पड़ोसी परिवार का बेटा जो ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता है मेरे पास आया और बोला- आंटी, अगले हफ्ते मेरे स्कूल में वाद-विवाद प्रतियोगिता है और मुझे इस विषय पर विपक्ष में बोलना है कुछ प्वोइंट्स बता दीजिये विषय था -’ बढ़ते वृद्धाश्रम घटते जीवन मूल्यों के प्रतीक हैं|’ उस समय तो मैंने उसे इस विषय से सम्बंधित नकारात्मकता पर थोड़ा विचार करते हुए कुछ बिन्दुओं पर बोलने के लिए कह दिया और वह चला गया| तत्पश्चात इस विषय पर मेरे मन में विचारों के आवागमन की आंधी सी चलने लगी……….पत्रिकाओं में भी बहुत पढ़ा था………उस समय कोई मंच नहीं था अपनी बात कहने के लिए… और फिर शांत हो गयी… इस जागरण मंच पर आने से आज इस आंधी ने फिर अपना रुख बदला तो निश्चित ही इस मंच के सभी बुद्धिजीवी व प्रबुद्ध पाठकों व लेखकों के साथ इस विषय के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर विचार बाँटना चाहूंगी|
कई अरसे पहले किसी पुस्तक में एक लघु कथा पढ़ी थी कितनी सही हो और कितना अंश विस्मृत हो गया हो कह नहीं सकती पर कुछ अंश स्मृति के एक कोने में आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है जो शायद विषय के प्रसंग में बताना उचित ही होगा ……..|
दो बूढ़े पेड़ आपस में बातें कर रहे थे——एक ने कहा ” एक समय था जब सभी बच्चे धूप से बचने के लिए मेरे छाया में खेलने के लिए आते थे……. मैं उन्हें उस समय घनी छाया देता था ……फल देता था…., लकड़ियाँ और पत्तियां भी देता था……. जो उनके बहुत काम आते थे….. वे सब बहुत खुश होते थे ” दूसरे पेड़ ने कहा- ” हम सभी वही तो करते हैं जो तुमने किया……. “सुनकर पहले पेड़ ने कहा- लेकिन अब कोई नहीं आता……|” इतने में कुछ बच्चे उन पेडों के पास से गुजरे , उन्हें देख कर पहले पेड़ ने उनसे पूछा- “बच्चों, अब तुम मेरे पास खेलने क्यों नहीं आते हो?” एक बच्चा बोला -” अब तो तुम्हारे पास छाया नहीं है……फल नहीं है………और कुछ भी नहीं है देने को …….” यह सुनकर उसे दुःख हुआ कहा- “हाँ अब मेरे पास मेरी छाल ही बची है चाहो तो यह भी ले लो….मैं तो जर्जर हो चला हूँ “सुनकर बालक चुपचाप चला गया…….दूसरा पेड़ उसे सांत्वना देता हुआ बोला- ” चलो दोस्त, यह तो इनकी दुनिया है अपना शेष जीवन इसी जंगल में ही बिताते हैं……….”
अगर हम मानवीय जीवन पर दृष्टिपात करें तो लगता है कि यह लघु कथा शायद उन सभी वृद्धों की सच्ची दास्तान बयां करती है जिन्हें अपनी जीवन संध्या काल में वृद्धाश्रम की शरण लेनी पड़ती है क्योंकि ये शारीरिक रूप से सर्वथा अशक्त व असहाय हो चुके होते हैं, जो अपनी संतान से दूर एकाकी निराशापूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं व आत्म सुरक्षा हेतु या फिर अपने आत्म-सम्मान की रक्षा हेतु अपनी संतान पर आश्रित नहीं होना चाहते| अपना शेष जीवन आज सभी सुविधा संपन्न इन आश्रमों के सेवादारों की छत्र-छाया में ही व्यतीत करते हैं जहाँ वे अपने नए साथियों के साथ शारीरिक या मानसिक व्यथा तथा अपने विचारों को बाँट सकते हैं…..निसंदेह आज ये वृद्धाश्रम आधुनिक सुविधा संपन्न होते हैंतथा उन्हें सुरक्षा प्रदान करते हैं पर अपनी उम्र के इस पड़ाव पर हमारे वृद्धों को ये आश्रम क्या भावात्मक सुरक्षा, आत्मीयता स्नेह दे सकते हैं जो अपनी संतान से और पारिवारिक सदस्यों से प्राप्त हो सकता है यह चिंतनीय व विचारणीय बिंदु है|
अब प्रश्न यह उठता है कि आज इन वृद्धाश्रमों की बढ़ती हुई संख्या भी क्या एक ऐसा घटक है जो हमारे जीवन मूल्यों को गिराने में अपनी एक अहम् भूमिका अदा कर रहा है? यदि विचार करें तो लगता है कि कहीं न कहीं हमारी भारतीय संस्कृति पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित हो रही है ,इसके साथ ही संयुक्त परिवारों के विघटन और एकल परिवारों की बाहुल्यता से हमारी मानवीय संवेदनाएं कहीं न कहीं मृतप्राय-सी हो गईं हैं……| आज के पारिदृश्य को देखते हुए सच्चाई तो यही है कि परिवार का हर सदस्य अपनी गतिविधियों में इतना अधिक राम गया है कि कोई भी किसी तरह से कहीं भी प्रतिबंधित नहीं होना चाहता है| युवा पीढ़ी व वृद्ध पीढ़ी के विचारों में सामंजस्य के लिए कोई स्थान ही नहीं रह गया है शायद इसलिए कि आज का युवा वर्ग कुछ अधिक ही योग्य और बुद्धिमान हो गया है| जेनरेशन गैप के कारण ही ये दूरियां बढ़ रहीं हों ( इस श्रेणी में सब नहीं हैं कुछ इसके अपवाद भी हैं ) केवल स्वादिष्ट भोजन ,अच्छे कपड़े और रहने की सुविधा देना और इन्हें वृद्धाश्रम में रख कर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती है या विदेश में रहने वाली संतान भी वृद्धाश्रमों में रह रहे वृद्ध माता-पिता के लिए इन आश्रमों को अनुदान राशि भेजती रहती हैं जिससे उनके बुजुर्गों को पूर्णरूपेण सुरक्षा मिलती रहे और ये वृद्धाश्रम भी पलते बढ़ते रहें………….फलस्वरूप इनकी वृद्धि में और भी चार चाँद लग रहे हैं……….. | क्या कभी हमने इन बुजुर्गों की मानसिक वेदना का अनुभव किया है? ………. मन की गहराई तक झांकने की कोशिश की है………..नहीं न …..शायद यह मानसिक वेदना ही शारीरिक वेदना से कहीं अधिक घातक होती है …………
सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है -भावनात्मक लगाव -आवश्यक नहीं है कि दो चार घंटे इनके साथ बिताएं जाएँ अपनी सभी गतिविधियों में से ५ मिनट यदि इनके साथ बाँट लिए जाएँ ,इनकी भावनाओं को समझ कर उनकी कद्र करें तो इनकी हार्दिक प्रसन्नता का कोई ठिकाना ही नहीं| क्यों न परिवार को हम एक ऐसी नाट्यशाला का रूप दें जहाँ हर पात्र की कार्य कुशलता उसके द्वारा निभाए जा रहे चरित्र में परलक्षित हो……….अपनी भारतीय संस्कृति भी संरक्षित रहे….तत्पश्चात न केवल हमारे जीवन मूल्यों का स्तर बढेगा बल्कि एक उच्च श्रेणी के अंतर्गत अपनी पहचान बना लेंगे और बढ़ते इन वृद्धाश्रमों की संख्या पर भी विराम लगेगा .. ….| काश ऐसा हो…..तब तो परिवार और समाज की तस्वीर ही…………..!!!!

………………..************……………..

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38 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ashish Mishra के द्वारा
December 15, 2012

गाँधी जी को एक व्रधाश्रम के शुभारम्भ में बुलाया गया तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया की जब यह बंद हो मुझे बुलाना मैं जरुर आऊंगा. बढ़ते व्रधाश्रम गंभीरता से सोचने से विवश करते हैं

Enzyncscatags के द्वारा
October 27, 2011

धन्यवादnounधन्यवाद”]],interjectionधन्यवादधन्यवादthanksthanksधन्यवादशुक्रिया

डॉ जय प्रकाश के द्वारा
December 10, 2010

अल्का जी, कन्फ्यूसियस का कथन है - \"The father who does not teach his son his duties is equally guilty with the son who neglects them.\" यूनानी नाटककार इरिपिडस के विचार भी देखें – \"Noble fathers have noble children.\" मुझे भी लगता है यदि मेरा पुत्र एक दिन मुझे घर से बाहर का रास्ता दिखाता है तो सबसे पहला दोष मेरा/ मेरी परवरिश का होगा। हम एक और बात आम तौर पर याद नहीं रखते वह है विकासवाद के सिद्धांत का एक तथ्य कि हमारी अगली पीढ़ी हमसे हर मामले में अधिक गुणवान है। हमें बांटना होता है अपना अनुभव, उन्हें सिखाना होता है अच्छे बुरे का ज्ञान और अनुशासन जो उनके पास नहीं। वृद्धाश्रम की बात जब भी होती है संतान ही दोषी ठहराई जाती है उसे जीवन का पाठ पढ़ाने वाला या उसकी शिक्षा क्या सच में पूर्णतः निर्दोष हैं?

    Alka Gupta के द्वारा
    December 29, 2010

     डॉक्टर साहब , अभिवादन घर से बाहर रहने के कारण यात्राके दौरान नेट की सुविधा उपलब्ध न होने के  कारण  और मेरी अस्वस्थता वश देर से उत्तर देने के लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।आपके द्वारा दिए गए उद्धरणों व आपके विचारों से मैं भी पूर्णतः सहमत हूँ। संतानें पूर्णरूपेण doshee नहीं होतीं कुछ सीमा तक वृद्ध भी ज़िम्मेदार हो सकते हैं। यहाँ  हमारी शिक्षा ,हमारे संस्कारों का बहुत मूल्य है लेकिन मुझे लगता है  कि पाश्चात्य संस्कृति की होड़ में हम ये सब खो चुके हैं और कहीं न कहीं अपना  अस्तित्व ही विलुप्त करते जा रहे हैं तत्पश्चात ऐसी कष्टदायक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।  आपकी मूल्यवान प्रतिक्रिया  के लिए हार्दिक आभारी हूँ धन्यवाद!

    Anil Goyal के द्वारा
    September 12, 2011
Aakash Tiwaari के द्वारा
November 27, 2010

अल्का जी, न जाने कैसे लोग बदल जाते है.न जाने कैसे लोग अपने माँ/बाप को यु ही किसी वृधाश्रम में छोड़ देते है.क्या उन्हें ये दर नहीं लगता की जो आज हम अपने माँ बाप के साथ के साथ कर रहे है शायद कल वो हमारे साथ भी हो… ऐसे दुष्कर्मियों की ये घटनाए देखकर बहुत तकलीफ होती है.. http://aakashtiwaary.jagranjunction.com आकाश तिवारी

    alkargupta1 के द्वारा
    November 28, 2010

    आकाश जी,    ये संवेदना शून्य दुष्कर्मी शायद ही कभी समझ पाएं कि इस नश्वर संसार में सभी को अपने अपने कर्मों का फल यहीं पर ही भोगना है इसी जन्म में ………वहाँ बस देर है अँधेर नहीं……! प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
November 25, 2010

सुश्री अलका गुप्‍ता जी, इन कुकरमुत्तों की तरह उग आए वृद्धाश्रमों के बारे में मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि इन्‍हें स्‍थापित करने वालों में से नगण्‍य की सोच ही कुछ सकारात्‍मक होती है अन्‍यथा तो सरकारी अनुदान को हड़पनें और वृद्धों की सम्‍पति को ठगनें की भावना लिए ही ये आश्रम बनाए जा रहे हैं। यह कहने का कारण है मेरे मित्र का अनुभव । जब उन्‍होंनें ठंड में एक गरीब वृद्धा को इन आश्रमों में आश्रय दिलाना चाहा जो सड़क पर पड़ी थी तो लगभग सात-आठ आश्रमों का यही जबाव था कि यदि आप यहां का लगभग 10-12 हजार रू महीने का खर्च उठा सकें तो हम इन्‍हें यहां रख सकते हैं क्‍योंकि इनकी देखभाल के लिए आपकों एक परिचर भी देना होगा । खैर यह तो थी आश्रमों की बात । लेकिन उस वृद्धा का इस तरह सड़क पर होना ही बता रहा था कि उसका परिवार कितना संवेदनहीन था । वास्‍तव में वृद्धों को बोझ समझनें की प्रवृति बढ़ रही है । लेख के अंत में की गई आपकी कामना की पूर्ति हो यही कामना कर सकता हूँ । अरविन्‍द पारीक

    Alka Gupta के द्वारा
    November 26, 2010

    श्री अरविंदजी,नमस्कार ये वृद्धाश्रम  पैसा कमाने का एक ज़रिया बन गये हैं और आपने तो इन वृद्ध महिला के बारे में बता कर साक्षात प्रमाण भी दे दिया है ईश्वर से प्रार्थना है कि इन संवेदनहीन परिवारों की सदबुद्धि के कपाट कभी खुलें……इन्हें बोझ न समझें  ….इनका तो साया होना हमारे लिए बहुत   बड़ी  बात है ……..मुझे लगा शायद मेरा लिखना सार्थक रहा  आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। . 

HIMANSHU BHATT के द्वारा
November 25, 2010

सामजिक समस्या का अति सुंदर ढंग से प्रस्तुतीकरण……… हमें तत्काल ही आपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा ……. अन्यथा यह समस्या गहरी होती जाएगी……

    Alka Gupta के द्वारा
    November 25, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत आभार

rajkamal के द्वारा
November 24, 2010

जब मेरे को पता है की शायद मेरी औलाद बुढ़ापे में मुझको वहाँ का रास्ता दिखा देगी … तो फिर मैं किसके लिए और क्यों आपने पापों का गठ्ठर विशाल करता जाता जाऊ ….

    Alka Gupta के द्वारा
    November 25, 2010

    अब से पुण्य ही कमाते जाएं देर न करें निश्चित ही फल मिलेगा प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

rita singh 'sarjana' के द्वारा
November 24, 2010

अलका जी , बहुत बढ़िया लेख l आपने सामाजिक इस समस्या को सुन्दर ढंग प्रस्तुत किया l जो बच्चा अपने माता-पिता की इज्जत नहीं कर सकता वो बच्चा अपने बच्चे को क्या संस्कार दे पायेगा l आपको ढेरो बधाई l

    alkargupta1 के द्वारा
    November 25, 2010

    रीताजी, आपका बहुत बहुत आभार ।धन्यवाद

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 24, 2010

बेहद सोचनीय विषय………. हम इस ओर से मुह फेरे हुए हैं……… पर कई बार ऐसा भी प्रतीत होता है………. की कहीं इस सबके लिए वृद्ध खुद जिम्मेदार तो नहीं………… इसको जरा समझना होगा………… आज जो लोग युवा हैं वो अपने बच्चों को यही समझा रहे हैं की पैसा है तो सबकुछ है……….. भावनाओं ओर संवेदनाओं को पैसे से तुलना करने लगे है…….. इन सबको केवल लिखने ओर बोलने तक ही सीमित करते जा रहे हैं……….. तो कैसे ये बच्चे भावनाओ ओर संवेदनाओं को समझेंगे……….. बढ़िया लेख ………. बधाई……………..

    Alka Gupta के द्वारा
    November 25, 2010

    आपका कहना  सही है हो सकता है कुछ सीमा तक वृद्ध जिम्मेदार हों  लेकिन मैं समझती हूँ उन्हें समझने कीनैतिक जिम्मेदारी तो हमारी ही होनी चाहिए तो  शायद उनकी भावनाओं व संवेदनाओं को समझ सकें क्योंकि इन्हें पैसे से   कभी नहीं तोला जा सकता है….. काश .हम यह समझ सकें..प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद धन व पैसा  

chaatak के द्वारा
November 24, 2010

अलका जी, आपके लेख को पढ़कर सहसा रस्किन बांड के लेख की यादें ताज़ा हो आई- “Mahmood was like the banyan, his hands gnarled and twisted like the roots of the ancient tree……He remembers when he was young and had fallen sick, everyone in the neighbourhood came to ask after his health. And now when his days were drawing to a close, no one visited him.” अच्छे लेख पर बधाई!

    Alka Gupta के द्वारा
    November 25, 2010

    चातक जी, प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
November 24, 2010

अलका जी आपका आलेख मंथन करने को विवश करता है मैंने भी जब ये मंच ज्वाइन किया था तो एक छोटा सा आलेख लिख इसी समस्या पर विचार किया था संपन्न होते हुए भी परिवारों के समक्ष ये संकट है बुजुर्ग पीढी को जिस पड़ाव पर आकर साथ चाहिए होता है तब सहानुभूति के बोल भी नहीं मिल पाते.आपका लेख बहुत अच्छा लगा.मेरा लेख पढने का समय मिलें तो कृपया पढ़ें.

    alkargupta1 के द्वारा
    November 25, 2010

    निशा जी, सहानुभूति तो दूर उनके साथ व्यवहार में भी कटुता आने लगती है मैंने तो स्वयं ही देखा है लोगों को……..मैं समय मिलने पर अवश्य ही आपका  लेख पढ़ूँगी   प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आपको लेख अच्छा लगा ।

    Jasemin के द्वारा
    September 21, 2011

    Heckuva good job. I sure appreicate it.

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 24, 2010

आदरणीया अल्का गुप्ता जी प्रणाम,वाक्य्यी बढ़ रहे ब्रिधास्रमो की संख्या आज के युवाओं के लिए सबसे बड़ी शर्म की बात है,जिसने जिन्दगी दी क्या उसे दो पल नहीं दिया जा सकता,समाज के लिए दीपक रूपी लेख देने के लिए आपका आभार!

    alkargupta1 के द्वारा
    November 25, 2010

    श्री धर्मेशम जी , नमस्कार  शायद आज का युवा वर्ग कुछ अधिक ही  योग्य,बुद्धिमान व आधुनिक हो गया है। प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।  

    alkargupta1 के द्वारा
    November 25, 2010

    कृपया आप अपना नाम धर्मेशम के स्थान पर  धर्मेश पढ़ें त्रुटि के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

sdvajpayee के द्वारा
November 24, 2010

एक अति संवेदनशील समसया पर सोचने को विवश करती पोस्‍ट। मेरा मानना है अलका जी कि रिश्‍तों  की संवेदना और ऊष्‍मा बहुत कुछ मूल्‍यों पर निर्भर करती है। हमें मूल्‍यों का क्षरण रोकने और उनकी मजबूत स्‍थापना के नियोजित व सार्थक प्रयास करने चाहिए। बृद्धावस्‍था को बोझ के बजाय सम्‍मानीय व यथासंभव समाजोपयोगी बनाना चाहिए। बृद्ध समाज और युवा पीढी को बहुत कुछ देने की स्थिति में रहते हैं। वृद्धाश्रम आज समय की मांग हैं। उन्‍हें भावात्‍मक रूप से और सम्‍पन्‍न बना कर बृद्धों के खालीपन को कम किया जा सकता है। साथ ही युवा वर्ग के कैरियर दबावों को भी ध्‍यान में रखना चाहिए। समय-समाज ऐसा होता जा रहा है जहां स्‍कूली दिनों से ही बच्‍चों के पास समय नहीं रहता। ठीक से खाने खेलने का भी। वे कोसे जाने केबजाय सहानुभूति के पात्र बनते जा रहे हैं।

    alkargupta1 के द्वारा
    November 25, 2010

    श्री बाजपेयी जी ,अभिवादन ,  आपके विचारों का बहुत स्वागत व सम्मान है फिर भी   मैं कुछ कहना चाहती हूँ   निश्चित ही वृद्धाश्रम  सुविधा संपन्न  हैंवहाँ उनका खालीपन  भी दूर होजाता है   लेकिन मै समझती हूँ कि जो भावात्मक सुरक्षा व  आत्मीयता अपने घर में अपनों से मिल  सकती है वहाँ नहीं।  अगर युवा वर्ग  अपना कैरियर बनाने के साथ साथ इनके बारे में भी थोड़ा  सोचें मुझे नहीं लगता है ये वृद्ध कैरियर में बाधक  बनेंगे। मैं आपकी बहुत आभारी हूँ   

mihirraj2000 के द्वारा
November 24, 2010

बहुत ही गंभीर विषय और अच्छी लेखनी का तड़का ने इसे सरल सहज बना दिया. जरुरी है एक आन्दोलन की एक शपथ लेने की तब जा कर विराम लगेगा वृधाश्रामो पर. शुभकामनाये.

    alkargupta1 के द्वारा
    November 25, 2010

    मिहिर जी , आंदोलन तो शायद नहीं लेकिन हाँ एक दृढ़ संकल्प तो बहुत  आवश्यक है। प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया     

R K KHURANA के द्वारा
November 24, 2010

सुश्री अलका जी, बहुत ही सुंदर लेख है ! एक ज्वलंत समस्या का उल्लेख किया है आपने ! आजकल लहू सफ़ेद हो गया है और वृद्धों को मजबूरन आश्रम में जाना पड़ता है ! राम कृष्ण खुराना

    alkargupta1 के द्वारा
    November 25, 2010

    श्रीखुराना जी,  इस आलेख पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद । आग भी अपनी टिप्पणी  से मेरा मार्गदर्शन करते रहें ।

roshni के द्वारा
November 24, 2010

अलका जी वृद्धाश्रमों के बारे में बस दो शब्द कहुगी धिक्कार है उन बच्चों पे जो अपने माता -पिता को यहाँ पे छोड़ कर चले जाते है ……. काश के उन का जनम हुआ ही न होता……. आभार

    alkargupta1 के द्वारा
    November 25, 2010

    रोशनी जी,  ये हीलोग तो है जो भावनाओं का आदर करना नहीं जानते जन्म  लेकर भी अजन्मे ही हैं अपनी भारतीय संस्कृति  को भी साथ में बदनाम कर रहे हैं। …प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत आभार   

abodhbaalak के द्वारा
November 24, 2010

अलका जी, वृधाश्रम हमारे जीवन मूल्यों के गिरने का प्रतीक है वरना जिन उँगलियों को पकड़ कर चलना सीखा, जिन मां की गोद में जीना सीखा, जिन कंधो पर बैठ कर हँसना सीखा, उनको कोई कैसे वृषा अवस्था में अपने से दूर कर सकता है, हम कितना भी व्यस्त हो जाएँ पर अपनों के लिए समय नहीं निकाल पाना मेरे नज़दीक अपराध है, भले जैसा की आपने कहा है की कुछ पल ही सही, प्रेम के साथ, सच्ची भावनाओं के साथ. अति सुन्दर रचना, समाज के एक बदनुमा धब्बे जिसे वृधाश्रम कहते है, को दर्शाती हुई http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    alkargupta1 के द्वारा
    November 25, 2010

     श्री अबोध जी, मैंने  इन  वृद्धाश्रमों  के बारे में बहुत कुछ पढ़ा था फिर बच्चे द्वारा लाए गए  विषय ने भी कुछ  सोचने समझने को विवश कर दिया था। बहुत ही भावात्मक  प्रतिक्रिया है आपकी ….. .. ….आज  ये समाज के शायद  बदनुमा धब्बे ही हैं…….।  आपका बहुत बहुत   आभार। 

Jack के द्वारा
November 24, 2010

आज सब यहीं जनरेशन गैप का रोना रोते है जबकि जनरेशन गैप जैसा कुछ दिखता ही नही यह तो सभ्य लोगों की नासमझी का ही एक नमूना है…. बेहद विचारणीय लेख…

    alkargupta1 के द्वारा
    November 24, 2010

     आपने सही कहा…….क्षमा कीजिए  क्योंकि अगर यह जनरेशन गैप नहीं है तो  ऩई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के साथ  सामंजस्य स्थापित कर पाने में अपने को क्यों  असमर्थ पा रहीहै   हमारी संवेदनाएं  क्यों शून्य हो रहीं हैं  सभ्य  व असभ्य  को   परिभाषित करने वालों के लिए  यह एक प्रश्न  चिह्न है हम बहुत कुछ अपनी सोच  पर भी नर्भर होते हैं  हमें  समझना होगा  कि यह गैप …..दूरियाँ…..  क्यों बढ़ रहीं हैं…..   आज….। आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार 

    Krystal के द्वारा
    September 23, 2011

    Way to go on this essay, hpeeld a ton.


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