sahity kriti

man ke udgaaron ki abhivyakti

89 Posts

2874 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3412 postid : 330

चिंता डायन खाय जात है..........!!

  • SocialTwist Tell-a-Friend

31 दिसंबर की रात्रि के प्रथम प्रहर से ही वर्ष २०११ दस्तक दे रहा था और हम सभी को आगाह कर रहा था कि अब समय आ चुका है ….2010 को अलविदा कहें तथा उसके आगाज़ की तैयारी में पलक पाँवड़े बिछाए रहें……. !
अब समूचे संसार ने उसे विदा कर दिया है और १ जनवरी के उगते हुए सूरज की अरुणिमा युक्त किरणों के साथ २०११ में पूर्णरूपेण प्रवेश कर चुके हैं ! प्रथम भोर तो रसानंद की तरंगों से तरंगित थी …..आगामी सुबहों का कुछ नहीं पता कैसी होंगी …..कैसा होगा यह २०११ …..क्या कुछ नया होगा …..या फिर कुछ और …..! परिवार…. समाज…..राष्ट्र……सभी के लिए अच्छा ही होगा…..या फिर बहुत अच्छा ……! हर्ष विषाद मिश्रित चिंता तो शायद हम सभी के ज़हन में हो रही होगी …… पर एक भय भी समाया हुआ है कि गत वर्ष तो महँगाई डायन खा गयी……….और अभी भी हम सभी के पीछे साये की तरह चक्कर काट रही है……. ! कहीं इस वर्ष चिंता डायन ना खा जाए………. | इसका शिकार होने से पहले ही कुछ करते हैं….. हम सब चिंता ही क्यों करें इस चिंता को छोड़ कुछ अच्छा करने की चेष्टाएँ ही क्यों न की जाएँ ,,,! जिसका फल मीठा हो और उस चिंता मुक्ति फल के रसानंद का हर कोई पान करे…….! भला हम सब चिंता के पात्र क्यों बनते हैं ? क्या है यह चिंता ? आइये थोड़ा बहुत जानने का प्रयत्न करते हैं और उससे मुक्त होने के उपाय भी खोजने की कुछ चेष्टा करते हैं |
चिंता मन की एक सूक्ष्म वृत्ति , दृष्टिकोण या स्वभाव ही है | चिंता करने से मनुष्य की स्मृति दुर्बल हो जाती है उसका विवेक धीमा पड़ जाता है व निर्णय शक्ति भी ठीक तरह से काम नहीं कर पाती | उसके कार्य में तन्मयता का अभाव हो जाता है और विपरीत परिणाम हो जाते हैं |
आज हर व्यक्ति चिंताओं के सागर में गोते लगा रहा है| कोई गोते लगाकर ऊपर आ जाता है और कोई गोते ही गोते लगाता रहता है ऊपर नहीं आ पाता और अन्दर ही अन्दर कहीं विलीन हो जाता है……..|
विद्यार्थी को अपने परीक्षा परिणाम की चिंता रहती है,तो माता -पिता को संतान के भविष्य की, निर्धनों को रोटी कमाने की चिंता है तो धनवानों को चिंता है कि वे अपना धन सही जगह इन्वेस्ट करें अथवा कि उनका काला धन पकड़ा न जाए | हमारे राजनीतिज्ञों को चिंता है कि वे किसी प्रकार शासन सत्ता की बागडोर अपने ही हाथों में लें |इस जागरण मंच पर भी अनेकों चिंताएं पायी गयी हैं अच्छा लिखने की चिंता , लेख के फीचर्ड होने की चिंता , अधिक टिप्पणी मिलने की चिंता तो शतक बनाने की चिंता  ( अपने सुधी पाठकों व लेखकों से मेरा नम्र निवेदन है कि इस प्रसंग को कोई भी व्यक्तिगत रूप से ना लें चूंकि हर क्षेत्र में चिंताएं पायी जाती हैं और हम सब इस मंच से सम्बन्ध रखते हैं इसलिए इसका थोड़ा सा ज़िक्र करना मैंने उचित समझा ) इस तरह यह चिंता आज सर्वत्र ही व्यापक रूप से व्याप्त है | प्रश्न उठता है कि इन चिंताओं की जंजीरों से कैसे मुक्ति मिले ?
यदि हम गंभीरता से मनन करें तो इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि मनुष्य चिंता तब करता है जब वह संदिग्ध मनः स्थिति में होता है या किसी न किसी प्रकार के अहित अथवा कुछ भी अनिष्ट होने की आशंका होती है | जैसे विद्यार्थी सोचता है कि अगर उसका परीक्षा परिणाम अच्छा नहीं हुआ तो बड़ा ही अहित हो जाएगा और एक बेरोजगार व्यक्ति यही सोच -सोच कर दुखी होता है कि अगर उसे शीघ्र ही कोई रोज़गार न मिला तो बड़ा अनिष्ट हो जाएगा…….एक निर्धन यह सोचता है कि आज उसने जितना पैसा कमाया उतने पैसे से वह अपने परिवार की दो जून की रोटी भी जुटा पायेगा या नहीं इसी तरह की न जाने कितनी और चिंताओं से नकारात्मक और असंदिग्ध मिश्रित विचार तरंगें उत्पन्न होती हैं तथा वातावरण और मनुष्य के मन को विकृत कर प्रायः वही परिणाम उत्पन्न कर देतीं हैं जो कि चिंतित मनुष्य शुभ या हितकर नहीं मानता | अतः हमें चाहिए कि कभी भी अशुभ या अनिष्ट की चिंता न करें……..बल्कि अपना तथा दूसरों का सदैव शुभ चिन्तक ही बनें रहें क्योंकि शुभ सोचने या चाहने से शुभ ही परिणाम होता है ……..|
चिंता तो ‘चिता’ सदृश होती है….. | मृतक की देह को जब अग्नि दी जाती है तब उसे दाह का अनुभव ही नहीं होता क्योंकि तब वह देह चेतना शून्य होती है लेकिन जीवित मनुष्य की देह को चिंता की दाह का अनुभव अवश्य होता है , इसलिए हम सभी को मानसिक मृत्यु रूपी चिंता से तो बच कर ही रहना चाहिए |
यहाँ कबीर दास जी का यह दोहा प्रासंगिक लगता है …….
चिंता ऐसी डाकिनी काट कलेजा खाय |
वैद बिचारा क्या करे कहाँ तक दवा लगाय ||
इस चिंता की बीमारी एक बार अगर लग गयी तो वह व्यक्ति को अन्दर तक बिलकुल खोखला कर देती है फिर तो डॉक्टर ,वैद्य ,हकीम दवा देते-देते इलाज करते-करते थक जायेंगे उनका मरीज़ तो ठीक होने से रहा फिर तो इन बेचारों के धैर्य का बाँध तो टूट ही जाएगा न………….इनके पास भी इस बीमारी की कोई दवा नहीं है |
एक चिंता दूसरी चिंता को जन्म देती है उसका आदर करती है…….. हमारे मस्तिष्क को अव्यवस्थित सा कर देती है मन की शान्ति को भी भंग करती है…………. |
हमें चाहिए कि अच्छा सोचने व अच्छा करने की चेष्टा तो करें किन्तु चिंता तो कदापि न करें….. हम सभी यही सोचते हैं ( किंचित विरले ही होंगे जो नहीं सोचते हैं ) कि पता नहीं क्या होगा ?…..और फिर इस चिंता से चिंतित होने लगते हैं|परन्तु इस ‘ डायन ‘ ( यह भी मनुष्य को दीमक की तरह अन्दर ही अन्दर खा जाती है ) से चिंतित होने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह तो निश्चित ही है कि होगा वही जो हमारे वर्तमान कर्मों तथा गत काल में किये गए कर्मों के फलस्वरूप होना होगा|
तब फिर जो दृश्य सामने आया ही नहीं तो फिर उसकी चिंता ही क्यों की जाए……….! समझना चाहिए कि यह संसार एक नाट्यशाला है जो कुछ यहाँ हो रहा है उसे हम एक दृश्य की तरह देख रहे हैं यह दृश्य समाप्त होने के बाद भविष्य रूपी परदे पर जो दृश्य आयेगा उसे भी देख लेंगे उसकी अभी से चिंता क्यों करें ……..जितना हो सके उतना दूर ही रहें इस चिंता डायन से ……….अन्यथा तो राम भरोसे ……सबसे अच्छा यही होगा कि हम अपने वर्तमान को ही सवाँरे वर्तमान के साथ साथ भविष्य भी सुधर जाएगा अन्यथा भविष्य की चिंता से वर्तमान भी अपना सुनहरा अवसर खो देगा…………! तो आइये २०११ में वर्ष भर चिंता मुक्ति के फल का रसास्वादन करते रहें !!

| NEXT



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

27 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sdvajpayee के द्वारा
January 8, 2011

 अल्‍का जी , अपने सुंदर लेख के समापनांश में आपने चिंता के आध्‍यात्मिक-वैज्ञानिक दृष्टिकोण देकर इसमें बडी कुशलता से परिपूर्णता ला दी है। संसार के प्रति यथासंभव यही बीतरागी भाव ही चिंता का अंकुरण न होने देने मे समर्थ है। लेकिन यह विवेकी मनोभाव सहज-सुलभ नहीं है। यह स्थिति तो शायद योगावस्‍था है। ज्ञान का प्रतिफलन है।   मुझे लगता कि शोक,चिंता और भय तीनों सजातीय और परस्‍पर संबंद्ध है। आपके उपाय ( जो अध्‍यात्‍म चिंतन का उपाय है) चिंता ही नही शोक और भय भी नहीं रह जाएंगे। रामायण में मोह,काम, क्रोध आदि के साथ ही चिंता को भी माया के 18 प्रबल परिवारों में गिना गया है। ये सब कलेश हैं जिनसे आत्‍म ज्ञान के द्वारा ही निपटा जा सकता है। चिंता को सांपिनि कहा है। यथा- चिंता सांपिनि को नहिं खाया, को जग जाहि न ब्‍यापी माया।   चिंता से दिन रात छाती जलती रहती है। चिंता ग्रस्‍त मनुष्‍य जीते जी मरा समान होता है। ” चिता चिंता समाख्‍याता किन्‍तु चिन्‍तु गरीयसी, चिन्‍ता दहति निजीर्वं सजीवो दह्यतेअनया” – चिता मरने पर जलाती है, पर चिंता जीते जी मनुष्‍य को जला डालती है।  मत्‍छर काहि कलंक न लावा,  काहि न सोक समीर डोलावा।  जोबन ज्‍वर केहि नहिं बलकावा, ममता केहि कर जस न नसावा। …………… यह सब माया कर परिवारा, पगबल अमित को बरनैपारा। इन्‍हीं क्‍लेशों को आगे मानस रोग कहा गया है। अर्वाचीन मनो विज्ञान का इस बारे में क्‍या मत है, मैं नहीं जानता। कभी प्रकाश डालिएगा।

    Alka Gupta के द्वारा
    January 9, 2011

    श्री बाजपेयी जी , सदर अभिवादन आपके बहुमूल्य व ज्ञानवर्धक शब्दों से युक्त दी गयी प्रतिक्रिया द्वारा मुझे विषय से सम्बंधित और अधिक ज्ञान मिला| विषय से सम्बंधित अर्वाचीन मनोविज्ञान के मत पर अगर संभव हुआ तो मैं ज़रूर प्रकाश डालने का प्रयास करूंगी| मैंने आपके अन्य लेख पढ़े थे उन पर कोई भी प्रतिक्रिया दे पाने में अपने को असमर्थ पा रही थी बस मुझे लगा कि मैं ज्ञान बटोर रही हूँ | मंच पर आपकी अनुपस्थिति बहुत महसूस होती है प्रतीक्षा है …. लेख सराहना के लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूँ | नव वर्ष २०११ आपको और आपके परिवार के लिए समृद्धिमय व मंगलमय हो !

    Alka Gupta के द्वारा
    January 9, 2011

    श्री बाजपेयी जी , कृपया सदर को ‘ सादर अभिवादन ‘ पढ़ें | त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ |

kmmishra के द्वारा
January 8, 2011

अलका जी आपको नव वर्ष और दशक की हार्दिक शुभकामनाएं । किसी ने ठीक ही कहा है चिंता चिता समान होती है । हो सकता है कि यह उसका व्यक्तिगत अनुभव हो । वह बेचारा चिंता करते करते चिता तक पहुंचा हो । मौलिक चिंतन की कद्र भारत में हमेशा से ही होती आयी है । . वैसे भगवान करे कि इस वर्ष किसी भी ब्लागर मित्र को चिंता नामक इस चिता के दर्शन न हों । आभार ।

    Alka Gupta के द्वारा
    January 8, 2011

    श्री मिश्रा जी , मैंने ब्लॉगिंग से सम्बंधित एक चिंता का तो निराकरण कर दिया है……..! अपनी अपनी शुभ सोच और हितप्रद चिंतन व थोड़े से अथक प्रयास से इस चिता के दर्शन से बचाव किया जा सकता है ऐसी मंगलकामना करती हूँ …….! ब्लॉगर मित्रों के लिए आपके शुभ चिंतन हेतु मेरा बहुत बहुत धन्यवाद ! आपको भी नव वर्ष समृद्धिमय व मंगलमय हो !

Arunesh Mishra के द्वारा
January 8, 2011

अलका जी, चलिए २०११ को चिंता का नहीं चिंतन का वर्ष बनाये :) …अच्छे लेख के लिए बधाई.

    Alka Gupta के द्वारा
    January 8, 2011

    अरुणेश जी , आशा तो यही करते हैं कि वर्ष २०११ में हम सभी का शुभ चिंतन रहे परिणाम अवश्य ही अच्छे होंगे……! प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद |

Syeds के द्वारा
January 7, 2011

आदमी जब से होश संभालता है बल्कि शायद जन्म के साथ ही… उसका सामना चिंताओं से होना शुरू हो जाता… है…आम आदमी की चिंता तो चिता में ही जाकर ख़त्म होती है… सुन्दर लेख http://syeds.jagranjunction.com

    Alka Gupta के द्वारा
    January 8, 2011

    सय्यद जी , निश्चित ही हर आदमी के जीवन में चिंताओं ने अपना डेरा डाला हुआ है….. यह हम पर ही पूर्णरूपेण निर्भर करता है कि हम उनके डेरे को कितना अधिक महत्त्व देते हैं उस डेरे को अपने जीवन से निकाल कर बाहर फेंकना चाहते हैं अथवा संजो कर रखना चाहते हैं…….यही बात सभी आम लोगों के जीवन से भी सम्बंधित है बशर्तें हम सब में आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प हो…..यदि इस छोटी सी ज़िंदगी को अच्छी तरह जीना है तो अपनी चिंताओं की चिता बनाकर शुभ चिंतन और मनन के साथ अपने जीवन की गति को आगे बढ़ाना होगा तभी अनुकूल परिणाम सामने आयेंगे …..! लेख पर दृष्टिपात करने के लिए व प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार !

rajkamal के द्वारा
January 7, 2011

आदरणीय अलका जी … सादर अभिवादन ! मुझको तो बस एक ही चिंता खाए जा रही हैकि इस ब्लागिंग से प्राप्त हुए धन कों किस बैंक में रखू .. भूत ही अच्छा लेख …बधाई

    Alka Gupta के द्वारा
    January 8, 2011

    राजकमल जी, नमस्कार इस चिंता से भी मुक्त कर देती हूँ आपको इस ब्लॉगिंग से प्राप्त धन एक ऐसा धन है कि जिसे कोई भी चोर चुराने का साहस भी नहीं कर सकता है इसे जागरण मंच ( बैंक ) पर खुले आम रख सकते हैं किसी अन्य बैंक की कोई आवश्यकता नहीं है और इस धन से प्राप्त ब्याज दर भी काफी मात्रा में प्राप्त होता रहेगा जो आपके भविष्य में भी काम आयेगा | उम्मीद है अब यह चिंता आपको नहीं खायेगी……….यह चिंता मुक्ति फल कैसा लगा ? ………. !! प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत शुक्रिया !

R K KHURANA के द्वारा
January 7, 2011

सुश्री अलका जी, जब हम संसार में आ गए है चिंता तो हमेशा लगी ही रही है ! कभी किसी बात की चिंता कभी किसी बात की ! जब चिंता समाप्त हो जायगी तो हम संत बन जायगें ! चाह गयी चिंता मिटी मनवा बेपरवाह, जिनको कुछ नहीं चाहिए वे शाहन के शाह !! राम कृष्ण खुराना

    Alka Gupta के द्वारा
    January 8, 2011

    श्री खुरानाजी , अभिवादन इस शाश्वत सत्य को मैं भी स्वीकार करती हूँ हम सभी सांसारिक व सामाजिक प्राणी हैं | हमारी सारी चिंताएं समाप्त जाएँ ऐसा भी नहीं है क्योंकि हम सभी गृहस्थाश्रम में रह रहे हैं आपके विचारों का स्वागत व सम्मान है लेकिन मैं ऐसा मानती हूँ कि जीवन में सफल व सुखी बनने की तथा बहुत कुछ पाने की चाह में केवल चिंताओं ने ही हमें चारों ओर से घेर लिया उन्हें कार्य रूप में अगर परिणित न किया जाए तो निश्चित ही मानवीय जीवन के लिए वे हानिकारक हो सकती हैं…… इसलिए बेहतर यही होगा कि उनसे दूर रहने की चेष्टा तो अवश्य की जाए व सकारात्मक सोच शुभ चिंतन को स्थान दिया जाए……..कुछ सीमा तक इस चिंता रूपी मृत्यु से मोक्ष तो मिल ही सकता है ! प्रतिक्रिया देने के लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूँ हार्दिक धन्यवाद !

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 7, 2011

भूत (जो बीत गया उस समय ) का पाश्चाताप ओर भविष्य की चिंता आदमी के वर्तमान को समाप्त कर देती है……… इसलिये भविष्य की चिंता को त्याग कर ओर भूतकाल मे जो हो गया उसका पश्चाताप करने के स्थान पर वर्तमान को पूरी तरह से जीना चाहिए……………. एक बढ़िया लेख के लिए बधाई………

    Alka Gupta के द्वारा
    January 8, 2011

    प्यूष जी , इस लेख के प्रति आपकी सकारात्मक सोच…..बहुत अच्छा लगा….अपने वर्तमान को अच्छी तरह जीने से भविष्य स्वयम ही सुन्दर हो जाएगा….साथ ही जीवन भी सरस….! और धीरे-धीरे चिंता भी अपना किनारा कर लेगी…..! प्रतिक्रिया के लिए बहिउट आभार |

allrounder के द्वारा
January 7, 2011

अलका जी चिंता और चिता मैं सिर्फ एक बिंदी का फर्क होता है, ऐसा कहते हैं और ये बात सही है, हमें चिंता करने की बजाय चिंतन करना चाहिए ! एक उत्कृष्ट लेख के लिए बधाई !

    Alka Gupta के द्वारा
    January 8, 2011

    सचिन जी , इस लेख के समर्थन में आपके विचारों का स्वागत करती हूँ ! प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद !

Deepak Sahu के द्वारा
January 7, 2011

अल्का जी! चिंता बहुत खराब चीज है लेकिन यह हर इंसान को किसी न किसी रूप मे खाती रहती है! अच्छा ब्लॉग आपका! धन्यवाद! दीपक

    Alka Gupta के द्वारा
    January 8, 2011

    दीपक जी , चिंता बहुत खराब चीज़ है इसीलिये मैं कहती हूँ कि वह इंसान को खा जाय उससे पूर्व ही इंसान को अपना कोई राहत कार्य तो अवश्य ही करना चाहिए तांकि वह अपनी प्यारी सी ज़िंदगी का लुत्फ़ उठा सके….. ! प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत आभार !

Aakash Tiwaari के द्वारा
January 7, 2011

अलका जी, ऐसा कोई भी इंसान नहीं जिसको किसी भी प्रकार की चिंता न हो..सभी को किसी न किसी प्रकार की चिंता ..सभी समस्या की जड़ भी यही है. आकाश तिवारी

    Alka Gupta के द्वारा
    January 8, 2011

    आकाश जी , तो फिर देर किस बात की आइये आप सभी हमारे साथ इस समस्या का समूल उत्खनन करते हैं तत्पश्चात उसके फलानंद का रसपान भी करते हैं…….. ! आपकी प्रतिक्रिया व हमारे साथ रहने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया !

abodhbaalak के द्वारा
January 7, 2011

Alka ji sunte aa rahen hain ki Chinta chita ki janani hai, so chinta chhod kar hamko keval karm par hi dhyan dena chahiye par ye kahna jitna saral hai, karna utna hi ….. baht hi sundar rachna ke liye bandhaai ho http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Alka Gupta के द्वारा
    January 8, 2011

    श्री अबोध जी, आपने बिलकुल सही कहा है कि कहना जितना सरल है करना उतना ही कठिन…. जैसा कि मैंने ऊपर भी कहा है कि किंचित विरले ही होंगे जो सोचते नहीं होंगे या चिंता नहीं करते होंगे…..लेकिन यदि हममें आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प है तो मुझे नहीं लगता कि अपनी चिंता व सोच को कार्य रूप में परिणित करने में कठिनाई होगी…….क्योंकि केवल चिंता करने से तो हमें कुछ भी हासिल नहीं होगा हाँ ईश्वर द्वारा प्रदत्त हमारी सुन्दर काया प्रतिदिन ही बीमारियों का स्वागत अवश्य ही करती रहेगी| उन चिताओं पर कार्य करने की थोड़ी सी भी अगर चेष्टा करें कुछ कष्ट का अनुभव तो जरूर होगा पर निश्चित ही फल मिलेगा…… यह मेरा स्वयम का अनुभव है…… प्रतिक्रिया के लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूँ धन्यवाद !

nishamittal के द्वारा
January 7, 2011

नमस्कार अलका जी,बहुत दिन बाद मंच पर.अच्छा लगा.आपने सही कहा है. अनागत की चिंता जो करता है वह दीर्घजीवी नहीं होता .ऐसा हमारे यहाँ कहा गया है.परन्तु जानते हुए भी किसी न किसी चिंता को अपने गले का हार बनाये रखते हैं.जो हानिकारक है.बहुत अच्छा लेख बधाई

    Alka Gupta के द्वारा
    January 8, 2011

    निशाजी , नमस्कार बहुत दिनों तक घर से बाहर थी और जब घर पहुँची तो स्वास्थ्य पर बीमारी ने धावा बोल दिया नव वर्ष में प्रवेश करते करते बिलकुल ठीक हो गयी हूँ……. और आप सभी से इस मंच पर रूबरू हुई…. हम सब एक सामाजिक प्राणी हैं निशाजी इसलिए चिंता करना तो स्वाभाविक ही है लेकिन इतनी अधिक नहीं कि उस चिंता में हम अपना स्वास्थ्य भी खो दें क्योंकि अति तो हर हर चीज़ की बुरी होती है| प्रतिक्रया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

deepak pandey के द्वारा
January 7, 2011

अलका जी सादर प्रणाम , चिंता और चिता में बस एक बिंदु का फर्क होता है . होना वही है जो राम ने रच रखा है हमें बस प्रयास करना चहिये

    alkargupta1 के द्वारा
    January 7, 2011

    दीपक जी , नमस्कार हमें इस बिंदु (.) को ही तो समझना है क्योंकि हमारी हिंदी भाषा में इसका इतना अधिक महत्त्व है कि शब्दों में अर्थ का अनर्थ हो जाता है और यह हिंदी भाषा भी हिंदी नहीं रह जाती कुछ और ही बन जाती है ! बस प्रयास करना ही हमारे बस में है करते रहना चाहिए आप भी करें और हम भी करें ! अच्छा ही होगा ! अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद !


topic of the week



latest from jagran