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ये मँहगाई ! ( इस साल भी गले लगाई !! )

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यूँ ही बैठी हुई , अपने ही ख्यालों में खोई हुई ,
कुछ अनमनी किंचित अन्यमनस्क सी ………..
कि अचानक आकर किसी ने झिंझोड़ा—
हुए झंकृत तार मन के !
आवाज़ आई – क्या नहीं पहचाना मुझे ?
उत्तर दिया – नहीं जान पाई तुझे , है कौन तू ?
दे परिचय मुझे अपना सारा |
वह बोली – सुन , भूल गयी तू इतनी जल्दी मुझे !
अभी पिछले साल ही तो मिली थी तुझसे !
तेरी आकांक्षाओं की बलि चढ़ रही थी ,
धूनी रमाए तू बैठी हुई थी |
तेरी ‘ तनया ‘ की अर्थी उठ रही थी ,
अपंगता का अहसास कर रही थी ,
गेह कोने में पड़ी सुबक रही थी !
आगे पीछे सर्वतः मैंने दस्तक दी……..,
पर तू तो इन सबसे बेखबर थी !
सुना ‘ उसको ‘ औ ख़त्म हुई वार्ता सारी |
एक कसक थी , दहशत थी दिल में कि बिजली सी कौंधी—-
फिर आ गयी ये निगोड़ी न जाने कहाँ से !
डर था मुझे कहीं पकड़ न ले ,
जुटा साहस लगाई गुहार मैंने–
चीखी……चिल्लाई……
चल हट, दूर हो जा यहाँ से ,
आज फिर क्यों आई मुझे भस्म करने ?
तू कौन है ? जान गयी अब मैं |
तू है महँगाई ! महँगाई !! महँगाई !!!

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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
November 16, 2012

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी …बेह्तरीन अभिव्यक्ति …!!शुभकामनायें.

pagal के द्वारा
October 8, 2012

thode aasan words de dete muskil nahi hoti pathaname

तू कौन है ? जान गयी अब मैं | तू है महँगाई ! महँगाई !! महँगाई !!! बहुत अच्छे अल्का जी हक़ीक़त यही है की यह महंगाई बहुत धीरे से आ जाती है और इसको पहचानना मुश्किल हो जाता है Raashid

    Alka Gupta के द्वारा
    January 18, 2011

    राशिद भाई, आपकी मूल्यवान प्रतिक्रिया के लिए बहुत शुक्रिया !

Aakash Tiwaari के द्वारा
January 13, 2011

आदरणीया अलका जी, महंगाई पर लिखी आपकी ये कविता वाकई काबिले तारीफ़ है…..इस कमरतोड़ महंगाई में गरीबो का बहुत बुरा हाल है……….. आकाश तिवारी

    Alka Gupta के द्वारा
    January 14, 2011

    आकाश जी , ये गरीब ही इस मार की चपेट में सबसे पहले आते हैं पर वे भी क्या करे उनकी आवाज़ तो हर जगह ही दब जाती है….बस किसी तरह अपनी गुजर बसर कर रहे हैं……! हौसला अफजाई के लिए आपका बहुत शुक्रिया !

Amit Dehati के द्वारा
January 12, 2011

चल हट, दूर हो जा यहाँ से , आज फिर क्यों आई मुझे भस्म करने ? तू कौन है ? जान गयी अब मैं | तू है महँगाई ! महँगाई !! महँगाई !!! बहुत सुन्दर रचना ,………….. बहुत बहुत बधाई !

    Alka Gupta के द्वारा
    January 13, 2011

    अमित जी , प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत धन्यवाद !

R K KHURANA के द्वारा
January 12, 2011

सुश्री अलका जी, मंहगाई के बारे में सुंदर कविता ! इस मंहगाई ने तो सबकी कमर तोड़ दी है ! इसका कोइ इलाज नज़र नहीं आ रहा ! भगवान् ही मालिक है ! खुराना

    Alka Gupta के द्वारा
    January 13, 2011

    श्री खुरानाजी , नमस्ते बेचारे गरीब आदमी पर ही इस महँगाई का सबसे ज्यादा असर पड़ता है…… ! कविता आपको अच्छी लगी बहुत आभारी हूँ | आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !

rajkamal के द्वारा
January 12, 2011

आदरणीय अलका जी …सादर अभिवादन ! आप की तो उस डायन से आमने सामने मुलाकात हो गई ….बड़ी ही खुशकिस्मत है आप … हमे तो वोह डायन खा भी जाती है और दिखाई भी नही देती …. सुन्दर एहसासों से सरोबार सुन्दर कविता … मुबारकबाद

    Alka Gupta के द्वारा
    January 14, 2011

    राजकमल जी , जिस दिन मेरी इससे ( गरीब आदमी जिसे मैंने इस डायन द्वारा खाते देखा था )मुलाक़ात हुई थी तो उसे देख कर मेरा मन बहुत ही दुखी हुआ और उफनते विचारों की एक नदी सी उमड़ पड़ी…….बहुत प्रयत्न किया भगाने का लेकिन नहीं भागी……. इसलिए मैं अपने आपको खुशकिस्मत नहीं मानती क्योंकि यह अदृश्य होकर आती है और धीरे धीरे हम सभी को खाने का प्रयत्न करती है…….! प्रतिक्रिया के लिए मैं आपका बहुत शुक्रिया अदा करती हूँ !

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 12, 2011

आदरणीय अल्का जी ………… महंगाई पर बेहतरीन कविता………… इस महंगाई ने माध्यम वर्ग को जब परेशान कर दिया है तो गरीब की दशा तो कहने योग्य ही  नहीं रही…………..

    Alka Gupta के द्वारा
    January 14, 2011

    पीयूष जी , प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया !

K M Mishra के द्वारा
January 12, 2011

अलका जी नमस्कार । ये मंहगाई डायन सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही है । पता नहीं वह हनुमान कहां हैं जो इसका मर्दन करेंगे । सुंदर कविता के लिये आभार ।

    Alka Gupta के द्वारा
    January 14, 2011

    श्री मिश्राजी , नमस्कार ये हनुमान शायद कहीं किसी सुरंग में छिपे पड़े हों हम सब इनके बाहर आने की बड़ी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे हैं कब ये बाहर आयें और इस सुरसा का मर्दन कर डालें तांकि कोई भी इसका शिकार न बन सके……….! आपकी सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !

abodhbaalak के द्वारा
January 12, 2011

alka ji kya koi rasta nahi sach me इसे रोकने का या की हम …. prasangik lekh par bandhaai sweekar karen http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Alka Gupta के द्वारा
    January 14, 2011

    अबोध जी , आप और हम सभी मिलकर इसके विरुद्ध आवाज़ उठाएं शायद हल निकले……पर ऐसा कहाँ होने वाला……ये तो हम लोगों से एरल टाईट की तरह चिपकी बैठी है…….! प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत आभार धन्यवाद !

Dharmesh Tiwari के द्वारा
January 12, 2011

आदरणीय अल्का जी नमस्ते………………सचिन जी ने बिलकुल सही फ़रमाया अब तो यही लगता है की ये महगाई सात क्या पता नहीं कितने सात जन्मो तक पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रही,धन्यवाद!

    Alka Gupta के द्वारा
    January 13, 2011

    श्री धर्मेश जी , नमस्ते ये अंतहीन ही है और ऐसा लगता है कि आगे आने वाले समय में भी इसका भयावह रूप ही होने वाला होगा…….. ! हम जनता को इससे टक्कर तो लेनी ही पड़ेगी कुछ भी अपने वश में नहीं है….! अपनी प्रतिक्रया देने के लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूँ , धन्यवाद !

allrounder के द्वारा
January 12, 2011

अलका जी मुझे लगता नहीं ये महंगाई अब सात जन्मों तक भी हमारा पीछा छोड़ेगी फिर भी हम लोग कवितायेँ लिखकर कोशिश तो कर ही सकते हैं ! नए साल मैं आपकी बेहतरीन कोशिश के लिए बधाई !

    Alka Gupta के द्वारा
    January 14, 2011

    सचिन जी , अब तो शायद इस महंगाई और हमारा हमेशा का साथ हो गया है इसने इतना कस कर दामन पकड़ा है कि छोड़ ही नहीं रही है……. प्रोत्साहन के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

nishamittal के द्वारा
January 12, 2011

चलिए बधाई आपको सबसे पहले मै ही दे दूं महंगाई की मार से त्रस्त सभी हैं आज.अच्छी कविता.

    Alka Gupta के द्वारा
    January 12, 2011

    निशाजी , यह महँगाई की मार इतनी जबरदस्त हैं कि शायद ही कभी ठीक हो….. सबसे पहले बधाई देने व प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत धन्यवाद !


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