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ये कैसी अग्नि .....! !

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ये भूख भी न जाने कैसी है !
भान होता….. जानी पहचानी सी है !
हर रोज़ दाह महसूस होती इसकी |
जाता हूँ हर रोज़ यहाँ वहाँ…..,
घूमता गली गली, कूँचे कूँचे ,
ढूँढता हूँ देखता हूँ……..,
न मिलता कहीं रोज़गार मुझे I
चोकर खाता, पानी पीता औ सो जाता ,
फिर भी न होती शांत दाह ये ,
काश ! ये भूखाग्नि न होती !
गरीब के मुख से आह न निकलती ,
रोटी के लिए लड़ाई न होती !
गर भूखाग्नि ‘प्रज्ज्वलित न होती…… ,
बन समिधा गरीब की आहुति उसमें न होती !
काश ! ये भूखाग्नि न होती !
इंसान को इंसान समझने में भूल न होती|
प्रतिस्पर्धा की होड़ न होती
ज़िंदगी में इतनी आपा धापी न होती ,
हर रोज़ की वारदात न होती ,
एकांगी बुजुर्गों की बलि न चढ़ती
काश !ये भूखाग्नि न होती !
धर्म के नाम पर झगड़े न होते ,
इंसान इंसान के खून का प्यासा न होता ,
आतंकवाद और अलगावबाद न होता |
देश की माटी रक्त रंजित न होती ,
बुझती लौ थम जाती ,
नारी दृगों में खून के आँसू न बहे होते !
फिर भी लगाए बैठा हूँ आस मन में अभी ,
यही कि— कभी तो कोई आयेगा मसीहा भी |
पर आज सोचता यही……
काश ! भूखाग्नि की दाह न होती !!
ये दाह न होती…………दाह न होती…….!!!

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41 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

R K KHURANA के द्वारा
January 26, 2011

सुश्री अलका जी, बहुत सुंदर कविता ! कहते है न किए यह पेट न होता तो शायद हमारा आपका भेंट न होता ! कहने का अर्थ है की पेट के खातिर अप्द्मी क्या क्या नहीं करता ! यह सरे प्रपंच हम इस की ज्वाला को शांत करने के लिए ही करते है ! खुराना

    Alka Gupta के द्वारा
    January 28, 2011

    श्री खुरानाजी , अभिवादन प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत धन्यवाद !

rita singh 'sarjana' के द्वारा
January 24, 2011

अलका जी, नमस्कार ,देर से प्रतिक्रिया दे रही हूँ अन्यथा न ले l अच्छी कविता बधाई l

    Alka Gupta के द्वारा
    January 25, 2011

    रीता जी , नमस्कार कोई बात नहीं , देर सबेर तो चलता ही है ! देर ही सही सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि कम से कम आपने सुध ली बस ! प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत धन्यवाद !

Rashid के द्वारा
January 24, 2011

विषय अच्छा है अलका जी, लेकिन मेरे अनुसार समस्या पेट की भूख की नहीं बल्कि हवस और लालच की है , पेट भरने के लिए तो २ रोटी ही काफी है.. राशिद

    Alka Gupta के द्वारा
    January 25, 2011

    राशिद भाई , निश्चित ही पेट भरने के लिए दो रोटी काफी हैं लेकिन समस्या तब आती है जब इंसान की हवस और लालचीपन इतना अधिक बढ़ जाता है कि दो रोटी में से भी एक हड़पना चाहता है इसके चलते उसकी तृप्ति कभी नहीं हो पाती और अनेक कुकृत्य करने लगता है फिर पारिवारिक , सामाजिक व राष्ट्रीय समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं | प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक शुक्रिया !

deepak pandey के द्वारा
January 24, 2011

अलका जी वैसे मुझे कविताओ की कोई विशेष समझ नहीं है पर विषय वहुत अच्छा है . पर ये सही नहीं की यही सब समस्याओ की जड़ है . पेट की भूख को तो भरा जा सकता है पर इन्सान की भूख जो हवस बन जाती है तो वह समस्याओ की जड़ बन जाती है . वर्ना ये तीन लाख साठ हज़ार करोड़ तो हर पेट की भूख शांत कर सकता था .

    Alka Gupta के द्वारा
    January 25, 2011

    दीपक जी , .आपके विचारों का स्वागत है……आज हर तरह की भूख ने इंसान को अपना ग्रास बनाया है जो अपना पेट भरने के लिए मुश्किल से एक रोटी जुटा पाता है उस पर भी दूसरों की जिनके पेट भरे हुए हैं गिद्ध दृष्टि लगी हुई है शांत कोई भी भूख नहीं हो पाती हवस की हो या अन्य…… किसी तरह आज इंसान ही इंसान के ऊपर इतना हावी होता जा रहा है कि इंसानी रिश्तों का कोई मूल्य ही नहीं रहा…….! प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत आभार !

allrounder के द्वारा
January 24, 2011

अल्काजी नमस्कार, पेट की अग्नि कई चीजों की जनक है, किन्तु आपकी कविता मैं जिन चीजों का इससे वास्ता दिखाया गया है, उसका मेरे विचार से पेट की भूख से नहीं बल्कि इंसान की और भूखों की तृप्ति होती है, जैसे आतंकवाद, रिश्वतखोरी आदि ! एक अच्छी रचना के लिए बधाई !

    Alka Gupta के द्वारा
    January 25, 2011

    सचिन जी , पहले तो पेट की भूख व तड़प को शांत करने के लिए आदमी को दो रोटी चाहिए कविता के प्रारम्भ में पेट की भूख से भी सम्बंधित पंक्तियाँ भी लिखी गईं हैं……….अगर आज कोई रोज़गार ही नहीं है तो वह दो रोटी क्या शायद आधी रोटी भी नहीं जुटा पायेगा पेट की भूख शांत नहीं होगी………. और फिर बहक जाते हैं उसके कदम……उसकी सोच व परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि किस ओर जाता है………और दूसरी तरफ जो भरे हुए पेट वाले होते हैं वे और अधिक पाने की लोलुपता में न जाने क्या क्या कर्म करते रहते हैं रिश्वतखोरी ,चोरबाजारी……. यहाँ तक कि दूसरे की हवस के शिकार भी बन जाते हैं…. फिर इन भूखों का दायरा आज इतना बढ़ गया है कि खत्म होता नज़र ही नहीं आ रहा है…….! किसी की आपबीती सुनकर मन थोड़ा आहत हुआ था बस अपने विचारों को आप सबके समक्ष प्रस्तुत कर दिया….. प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत धन्यवाद !

Dharmesh Tiwari के द्वारा
January 24, 2011

आदरणीया अल्का जी प्रणाम,हकीकत को बखूबी लाईनों में सजाया है ,धन्यवाद!

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    श्री धर्मेशजी , सादर नमस्ते आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए बहुत आभार !

वाहिद काशीवासी के द्वारा
January 24, 2011

चंद छान्दिक त्रुटियों के अलावा बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति अलका जी| यूँ ही अपनी कृतियाँ प्रस्तुत करती रहें और हमें आह्लादित करती रहें| धन्यवाद आपका

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    वाहिद जी , छान्दिक त्रुटियों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए आपकी बहुत आभारी हूँ अगर आप सबकी समालोचनात्मक टिप्पणियां व स्नेह मिलता रहे तो कोशिश जारी रहेगी…. आपके प्रोत्साहन के लिए हार्दिक धन्यवाद !

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
January 23, 2011

आदरणीय अलका जी सादर अभिवादन जहाँ तक मैं समझता हूँ, अब भूख का क्षेत्र दिन प्रतिदिन विस्तृत होता जा रहा है, किसी की पेट की भूख भी नहीं मिट पाती कोई, दौलत, शोहरत और सत्ता का भूखा है भूख के दुष्परिणामों पर प्रकाश डालती सुन्दर रचना आभार

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    शैलेश जी , बहुत सही कहा आपने आज ये भूख अपने व्यापक रूप में सर्वत्र ही व्याप्त है इसकी खाई इतनी गहरी खुद चुकी है कि जिसे पाटना बड़ी टेडी खीर ही है….. प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ! कृपया अन्य रचनाओं पर भी अपनी समालोचनात्मक टिप्पणी दें हार्दिक आभार !

naturecure के द्वारा
January 23, 2011

अलका जी , सादर प्रणाम! बहुत ही अच्छी रचना के लिए बधाई! डॉ.कैलाश द्विवेदी

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    डॉक्टर साहब , प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत आभार !

rajni thakur के द्वारा
January 23, 2011

अलका जी भूख का विकराल रूप दिखलाती एक मर्मस्पर्शी रचना…इस भूख की भूख कभी मिटती ही नहीं,कोई जतन कर लें…

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    रजनी जी , प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत आभार !

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    राजेशजी , आपकी कविता की पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर हैं निस्संदेह आदमी इस दुनिया में अकेला ही आया है और सांसारिक माया मोह के बन्धनों से मुक्त होकर अकेला ही उसे यहाँ से जाना है……\’ अच्छा सन्देश दे रही हैं |सुख में सुमिरन सब करे दुःख में करे न कोय| सुख में सुमिरन सब करे तो दुःख कहे को होय | कबीरदास जी ने भी यही कहा है| आपने भी इसी बात का समर्थन किया है……अक्षरशः सत्य है व्यक्ति को अपने जीवन युद्ध भी स्वयम ही करना होगा…….लेकिन अगर आदमी के पेट की ये भूखाग्नि शांत नहीं होती है इसकी दाह से उत्पन्न दुःख तो केवल एक भूखा ही जान सकता है……इस दाह को दूर करने के लिए शमन आवश्यक है इसके लिए वह किस सहारे को चुनता है बहुत कुछ उसकी सोच व परिस्थितियों पर निर्भर करती है……बुरा भी और अच्छा भी भूख से तड़पते हुए को अगर कोई भी कुछ देता है या उसके दुःख मे सहभागी बनता है सही रास्ता दिखता है तो उसके लिए शायद अच्छा होगा ……… !

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    आपकी साईट पर मैं अवश्य जाऊंगी तथा आपकी रचनाओं को पढूंगी | प्रतिक्रिया के लिए बहुत धन्यवाद !

roshni के द्वारा
January 23, 2011

अलका जी, भूख इंसान से कितने ही कुकर्म करवाती है ……… एक इंसान को भूख ही हैवान बनाती है कसश की भूख बनी ही न होती तो दुनिया चैन से जी रही होती बहुत ही मार्मिक कविता

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    रोशनी जी , ये भूख ही तो इतनी बुरी होती कि इंसान हर कुकृत्य करने के लिए भी उद्यत हो जाता है फिर उसका क्या परिणाम होगा उसे कुछ समझ नहीं आता क्योंकि फिर तो विनाश काले विपरीत बुद्धि वाला हिसाब हो जाता है ……..! प्रतिक्रिया के लिए आपका haardik धन्यवाद !

rajkamal के द्वारा
January 23, 2011

आदरणीय अलका जी …सादर अभिवादन ! यह पेट की भूख के बखेड़े ही तों भगवान के लिए सही बैठे हुए है …. अगर यह आपाधापी ना हो तों फिर इस दुनिया में सभी लोग अमन चैन से रहते हुए प्रभु की भक्ति करेंगे और काल बेचारा हाथ ही मलता रह जाएगा …. और स्वर्ग में ट्रैफिक जाम की समस्या होगी वोह अलग से …. तों इसलिए मैं समझता हूँ की भगवान ने जो भी किया है वोह ठीक ही किया है

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    राजकमल जी , इस रचना को मैंने किसी परिवार की आप बीती घटना को सुनकर दुखी मन से लिखा और पोस्ट कर दी और फिर आज आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर बहुत हंसी भी आई………! प्रतिक्रिया में भी हास्य व्यंग्य के दर्शन……..बेचारा काल……स्वर्ग में ट्रैफिक जाम की समस्या……! फिर तो निपटने देते हैं भगवान् को ही…… और हम सब इस धरती पर आनंद लेते हैं……ठीक है न ! रोचक प्रतिक्रिया के लिए बहुत आभार !

abodhbaalak के द्वारा
January 23, 2011

अलका जी पेट की आग क्या होती है कओई उनसे पूछे जिन्हें सच में भूख का ज्ञान हो…. भगवन से प्रार्थना है की किसी को …. और सच तो ये है की जब पेट की आग भर जाती है तो ही आदमी को…. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    अबोधजी , कुछ ऐसा कहा जाता है कि जीने के लिए खाओ न कि खाने के लिए जीओ | तो जो केवल खाने के लिए ही जीते हैं उनके पेट तो कभी भर ही नहीं सकते हम सभी जानते हैं और जिन्हें केवल जीने के लिए खाने को मुश्किल से नसीब होता है आज उन्हें वो भी नहीं मिल पा रहा है और फिर शुरू हो जाता है कभी न थमने वाली भूख…….. ऐसी स्थिति में हम सब भगवान् से यही प्रार्थना कर सकते हैं कि वह उन्हें ऐसी सद्बुद्धि दे जिससे किसी अनहोनी के शिकार न बनें ! प्रार्थना में बहुत बल होता है ! आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए बहुत धन्यवाद!

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 23, 2011

पेट की भूख के कारण ही पेट को पापी कहा जाता है……. पर एक भूख मन की भी होती है… पेट की भूख खाने के बाद खत्म हो जाती है….. पर मन की भूख ज्यों ज्यों इसको मिटाने की कोशिश करो त्यों त्यों बढ़ती जाती है……. इस भूख को मिटाने के लिए कई बार आदमी जानवर से भी नीचे गिर जाता है………  अच्छी प्रस्तुति बधाई………

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    पीयूष जी , बिलकुल सही कहा है आपने पापी पेट का ही सवाल है………न जाने इसकी और कितनी भूखें हैं जिनका शिकार इंसान को होना पडेगा ………! और मन की भूख ये तो एक मृग तृष्णा ही है…….पीछे-पीछे भागता है पर किनारा नहीं मिलता…..फिर ऐसे कुकृत्य और दरिंदगी कि परिवार ,समाज व देश के लिए दागदार हो जाता है फिर कितना भी सिर छिपाने की कोशिश की जाए बेदाग़ नहीं हो सकता ! कोई ईमान धर्म ही नहीं……..! आपकी अमूल्य प्रतिक्रया के लिए मेरा हार्दिक धन्यवाद !

adil के द्वारा
January 23, 2011

My name is adil i read your poem i like yiur poem so thank you so please contact my blog my blog name is math passion .

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    आपने कविता पसंद की अच्छा लगा मैं जरूर आपके ब्लॉग को पढूंगी | प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत धन्यवाद !

nishamittal के द्वारा
January 23, 2011

अलका जी सर्वप्रथम तो अच्छी रचना के लिए बधाई.ये भूख की ज्वाला ही है जिसके कारण सब विवश हैं.क्या विडंबना है न.एक तो इसलिए दुखी कि सब कुछ है,पर खा नहीं सकता और एक इसलिए कि वह खाना चाहता है पर है ही नहीं.

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    निशाजी , आपके प्रोत्साहन के लिए हार्दिक धन्यवाद ! शायद आज के वर्तमान समय का यही कटु सत्य है!

आर.एन. शाही के द्वारा
January 23, 2011

अलका जी, इस गड्ढे को भरने के लिये इंसान सौ-सौ जुगत भिड़ाता है, फ़िर भी गड्ढा खाली का खाली । लेकिन उनको क्या कहें जिनकी सात पुश्तों के गड्ढे भरने के पुख्ता इंतज़ामात के बाद भी दूसरों का हक़ मारने के लिये रात दिन एक किये हुए हैं ? यह तृष्णा है, जिसका गड्ढा पांच मिनट के लिये भी तुष्ट नहीं हो पाता । मर्मभेदी रचना के लिये साधुवाद ।

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    आदरणीय शाही जी , सादर अभिवादन एक लम्बे अंतराल पर प्रतिक्रिया मिली बहुत ही अच्छा लग रहा है इस मंच पर कुछ लिखने की हिम्मत बढ़ती है | बहुत ही दुःख होता है ऐसे लोगों की प्रवृत्ति को देख कर जिनके बड़े हुए व भरे हुए पेट होने के बावजूद भी दूसरे का हिस्सा लेने के लिए अपना मुंह बाए खड़े हैं अंत समय मे न जाने इनका क्या हश्र होगा…..ईश्वर से भी नहीं डरते इतने निर्मोही व पापी है ये लोग……. बहुमूल्य शब्दों से युक्त प्रतिक्रिया के लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूँ धन्यवाद !

sdvajpayee के द्वारा
January 22, 2011

भूख-प्‍यास, नींद, बीमारी,बुढापा और जीने की लालसा ही सब को नचाती है।

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    आदरणीय बाजपेयी जी ,सादर अभिवादन सही में ये सब ही हमें एक कठपुतली की तरह जिधर चाहें उधर ही नाचा देते हैं और हम नाचने लगते हैं बस इंसान उसी के अनुसार अपने अपने सुकर्म और कुकर्म करने लगते हैं…….| प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद !

ravindra के द्वारा
January 22, 2011

सच कहा aap ne yahi sach hai aaj ka ki insaan bhookh mitane ke liye kuch bhi karne ko taiyar hai WEEL DONE keep it UP

    Alka Gupta के द्वारा
    January 24, 2011

    रविंद्र जी , प्रोत्साहन के लिए आपका बहुत आभार ! अन्य रचनाओं पर भी आपकी समालोचनात्मक प्रतिक्रिया अपेक्षित है ! धन्यवाद !


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