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`` प्रेम बहती हुई नदी की धार है! --- valentine contest ''

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18795282[1]

जागरण मंच पर १ फरवरी से सर्वत्र प्यार की वर्षा शुरू हो गयी है ! और अब थमने का नाम ही नहीं ले रही है…….और थमे भी क्यों ? क्योंकि इसकी रिमझिम रिमझिम करती ये फुहारें देश विदेश के सुदूर कोनों कोनों तक जो पहुँच चकी हैं और कोई भी अपने को इन फुहारों से बचा नहीं पाया…….! हर किसी को अपनी आर्द्रता से सिक्त कर भाव विभोर कर दिया है…..! इसीलिये तो ये नहीं थम रहीं हैं और थमना भी नहीं चाहिए…….! प्रेम-वर्षा संबंधी विभागाधिकारियों ( जा. जं.) द्वारा मिली सूचनानुसार १४ फरवरी को ये फुहारें अपना अंतिम रूप ले लेंगी……..! और हर किसी के अंतर में अपनी अमिट छाप छोड़ कर मानव मन को आह्लादित करेंगी……! इन फुहारों ने तो मुझे भी नहीं छोड़ा और बहुत ही सुन्दर से इस ढाई आखर ‘ प्रेम ‘ पर अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लोभ को संवरण न कर सकी और लेखनी भी उद्यत हो गयी अपने मनोभावों को मंच पर सभी के साथ साझा करने के लिए……….!

यह छोटा सा ढाई अक्षर वाला ‘ प्रेम ‘ शब्द इतना गूढ़ है कि इसकी गूढ़ता को समझना थोड़ा बहुत कुछ मुश्किल सा ही है अन्यथा तो इन ईर्ष्या, द्वेष ,बैर जैसे आदि भावों की उत्पत्ति ही न होती……| इस संसार में प्यार की भावना हर प्राणी जगत में सर्वत्र व्याप्त है | प्रेम की इस सर्व व्यापी भावना से साधारण मानव तो क्या राजे -महाराजे और ऋषि मुनि तक स्वयं को असंपृक्त नहीं कर सके…….! कृष्ण-राधा , विश्वामित्र- मेनका ,दुष्यंत -शकुन्तला आदि के प्रेम-प्रसंग सर्वविदित ही है यहाँ तक कि इस दुर्दमनीय भावना से भारत ही नहीं बल्कि विश्व के महान जननायक भी अछूते नहीं रहे | नेपोलियन -जेसेफीन , आइन्स्टाइन-मिलेवा आदि न जाने कितने प्रेम प्रसंग……! इन प्रेम आख्यानों से पूरा साहित्य भरा पडा है | अधिकांशतः लोक कथाओं का मूल आधार ही स्त्री – पुरुष प्रेम प्रसंग ही होते हैं……..और ये इतने चर्चित हैं कि इनकी गूँज आज भी जीवित है……..! इनके प्रेम-प्रसंग वासना मुक्त पवित्र और अनन्य प्रेम के ज्वलंत उदाहरण हैं…….लैला-मजनूं ( वर्त्तमान समय के आधुनिक लैला मजनूँ नहीं ) शीरीं-फरहाद, यूसुफ़ और जुलेखा आदि……..!

अगर हम विचार करें तो आज भी प्रेम का वही स्वरूप है उसमें गरिमा है ,पवित्रता है और वह वासनामुक्त भी है |

प्रेम शब्द बड़ा ही कोमल मधुर व रोमांच भरा है | इसका कोई भी शरीर , अवयव या आकार नहीं होता है लेकिन साहित्य-शास्त्र के आचार्यों ने ऐसा माना है कि इसका केवल एक रंग —’ लाल ‘ ही होता है ! क्या रक्त जैसा लाल ? अरे , आप सब डरें नहीं यह रंग रक्त जैसा लाल नहीं बल्कि प्रातः काल सूर्योदय से पहले की अरुणिमा जैसा उजास ! पवित्र और मधुर भावना जगाने वाला भाव ! यह रंग उस समय स्पष्ट देखा जा सकता है प्रेमीजनों ( ये प्रेमी जन कोई भी हो सकते हैं…..माता-पिता, भाई-बहन, दो बहन ,दो भाई ,लड़का-लड़की, युवक-युवती या पति-पत्नी या अन्य कोई प्राणी जीव ) के चेहरों पर जब वे एक दूसरे के सामने आते हैं या उनके सामने उन्हीं के प्रेम की चर्चा की जाती है ! वैसे जो भी हो यह प्रेम भाव हृदय का सर्वाधिक सुन्दर ,अति कोमल व मधुरतम भाव माना जाता है ! और इस प्रेम भाव के साथ जब श्रद्धा का भाव भी जुड़ जाता है तब एक नई भावोत्पत्ति हो जाती है जिसे भक्ति-भाव कहा जाता है और शायद इसीलिये प्रेम को पूजा माना जाता है………! प्रेम की राह बड़ी ही कठिन और निराली है………! इसमें अहंकार ,लोभ ,व स्वार्थ को कोई स्थान नहीं है त्याग , समर्पण की भावना का ही समावेश है…….वही प्रेम सच्चा ,उच्च और महान है……. !

प्रेम का केंद्र जड़ चेतन कोई भी प्राणी या पदार्थ बन सकता है इसका क्षेत्र बड़ा ही विस्तृत है इसलिए इसे व्यापक तत्त्व के रूप में ही माना जाता है ! प्रेम के संसार मे अपने-पराये का, उंच-नीच का भेद बिलकुल ही नहीं रहता | प्रेम की खातिर लोगों को तप व त्याग करते तो देखा ही जाता है यहाँ तक कि प्राणों का बलिदान भी करते हुए देखा जा सकता ……! यह एक ऐसी अनोखी राह है जिस पर चलकर ‘ जियो ओर जीने दो ‘ जैसी मानवीय भावना जन्म लेती है और इसी दृष्टि से प्रेम गर्व से जीना मरना सिखाता है हर विपत्ति को सहन करने की शक्ति देता है…….|

प्रेम एक नशा भी है और चूंकि नशा आदमी को उन्मत्त और अँधा भी बना देता है शायद इसी कारण प्रेम को अंधा भी कहा जाता है अर्थात आँखें बंद करके , उन्मत्तता के साथ मग्न होकर प्रेम पंथ पर बढ़ जाने वाला व्यक्ति अतः यह राह और इसके राही दोनों ही बड़े ही निराले कहे गए हैं | आज भी न जाने कितने ही लोग इस राह पर चलने का दम भरते हैं , परन्तु वासना और स्वार्थों की बाहरी फिसलन पर ही फिसल कर रह जाया करते हैं………! इस निराले पंथ पर तो चलने के लिए सम्पूर्ण समर्पण त्याग और बलिदान का उत्साही भाव कि जो सब कुछ भुला दे…….! याद रहने दे केवल प्रेम का रूप और इसका नाम……! बस और कुछ भी नहीं…….!

प्रेम एक अद्वितीय जीवन संगीत है जिसमें मधुर स्वर लहरियां हैं और जब यह किसी के भी जीवन में संगी-साथी के रूप में प्रवेश करता है तो वहाँ जीवन संगीत समाप्त हो जाता है और बच जाते हैं टूटे-फूटे अवयवों के रूप में प्रेम प्रकरण जो अतीत के पृष्ठों में अंकित होकर वर्तमान समय में साध्य और हृदय तंत्रियों से से जुड़े तारों की गाँठ को तोड़ कर दो प्रेमियों को इस संसार के भ्रमजाल में छोड़ जाते हैं…………! अपवादों की भी कमी नहीं है ये हर क्षेत्र में होते हैं……. !

ये प्रेम तो बहती हुई ऐसी एक नदी है जिसके बहाव में तैरने वाले के हाथ में मोती, सीप, शंख, कंकड़, अनमोल रत्न आदि न जाने क्या-क्या चीज़ें आती हैं………! इस नदी में तैरते-तैरते एक किनारे पर दो प्रेमी जीवों का मिलन हो जाता है और फिर प्रारम्भ हो जाता है जीवन का एक नया अध्याय…….!

कितनी भी पाबंदियां क्यों न हों , बाधाएं व रुकावटें भी क्यों न आयें लेकिन वे दो हृदयों के मिलन को कदापि नहीं रोक सकती हैं………! प्यार की जीत होती है……वह तो कभी हारता ही नहीं……..हार कर भी प्यार जीतता ही है………..! यह प्रेम शाश्वत है………..! प्रेम की इस नदी में डुबकी लगाने पर इसकी मिठास ,सुगंध और भीनी-भीनी महक सच में कैसी है क्या होती है वाकई बयां करने वाली नहीं होती……….!

परखिये आप सब भी मेरे इन विचारों को अपने अमोल स्नेह की कसौटी पर और मुझे भी अवगत कराइए………..!

धन्यवाद !

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40 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 7, 2011

आदरणीया अल्का जी, बहुत ही अच्चा,और खूबसूरत लेख… शुभकामनाओं सहित आकाश तिवारी

    Alka Gupta के द्वारा
    February 9, 2011

    आकाश जी , आपको मेरा हार्दिक धन्यवाद !

rita singh \'sarjana\' के द्वारा
February 6, 2011

अलका जी , नमस्कार l सबसे पहले velentine contest के लिए हार्दिक बधाई l प्रेम के अनेक रूपों से अवगत कराता तथा प्रेम को सर्वोच्च मानता एक बेहतरीन लेख के लिए आपको बहुत-२ बधाई l

    Alka Gupta के द्वारा
    February 7, 2011

    रीता जी, प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार ! धन्यवाद!

rajkamal के द्वारा
February 5, 2011

जब यह किसी के भी जीवन में संगी-साथी के रूप में प्रवेश करता है तो वहाँ जीवन संगीत समाप्त हो जाता aadrniy अलका जी सादर अभिवादन ! मैं उपर लिखित पंक्तियों के अर्थ नही समझ पाया था , आपके स्पष्टीकरण के बावजूद भी, इन लाइनों में शायद कुछेक छूट सा गया है …. गुस्ताखी माफ

    Alka Gupta के द्वारा
    February 6, 2011

    राजकमल जी, मेरा संकेत केवल उस विवाहित जीवन की ही ओर था जहाँ तीसरा कोई अन्य जाने अनजाने में ही प्रवेश करना चाह रहा हो तब वहां जीवन का माधुर्य समाप्त हो जाता है यहाँ तक कि जीवन की समरसता भी जाती रहती है | आपकी प्रतिक्रिया के स्पष्टीकरण में शायद यह भाग रह गया होगा | अपने विचारों से अवगत कराएं……! धन्यवाद

Dharmesh Tiwari के द्वारा
February 5, 2011

आदरणीया अल्का जी सादर प्रणाम, यह एक ऐसा विषय चल रहा है आजकल जागरण जंक्सन जिस पर वर्षा तो होनी ही है अब चुकी प्यार एक ऐसा विषय है जिस पर कुछ भी लिखना अधुरा ही है इसके बारे में कितना भी लिखने की कोशिश कर दी जाय शायद कम ही पड़ेगा,आपने अपने इस लेख में बहुत ही खुबशुरत तरीके से प्रेम/प्यार पर प्रकाश डाला है,धन्यवाद!

    Alka Gupta के द्वारा
    February 5, 2011

    श्री धर्मेश जी , नमस्ते आपने बहुत ही सही कहा है कि इस विषय पर जितना ही लिखा जाये वह सब अधूरा ही है……! आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए मेरा हार्दिक आभार !

Preeti Mishra के द्वारा
February 5, 2011

अल्काजी आपने बहुत ही सुंदरता से प्यार की परिभाषा समझाई है. अच्छी रचना. वैलेन्टाइन कांटेस्ट के लिए शुभकामनाएं.

    Alka Gupta के द्वारा
    February 5, 2011

    प्रीती जी, प्रतिक्रिया के लिए आपको मेरा हार्दिक आभार !

Deepak Jain के द्वारा
February 5, 2011

अलका जी, प्रेम को परिभाषित करने का एक अच्छा प्रयास उसके लिए धन्यवाद

    Alka Gupta के द्वारा
    February 5, 2011

    दीपक जी , प्रेम जैसे गूढ़ शब्द को तो समझ कर उसे कोई भी परिभाषा देना बहुत ही कठिन है क्योंकि यह इस दुनिया में अपने सर्वव्यापी रूप में व्याप्त है बस इस शब्द पर मेरे विचारों की एक छोटी सी अभिव्यक्ति मात्र थी ! प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत आभार !

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 5, 2011

आदरणीय अलका जी………… इस सुन्दर प्रस्तुति…….. के लिए बधाई………..और इस कंटेस्ट के लिए हार्दिक शुभकामनाएं……

    Alka Gupta के द्वारा
    February 5, 2011

    पीयूष जी , प्रतिक्रिया के लिए मेरा हार्दिक आभार !

    Nettie के द्वारा
    September 23, 2011

    Wow, that’s a really cleevr way of thinking about it!

Amit Dehati के द्वारा
February 5, 2011

आदरणीय अलका जी प्रणाम ! बहुत ही अच्छे ढंग से प्रेम की परिभाषा दिया ………इस लेख के शब्दों के फुहारों से मन सराबोर हुआ इसके लिए आपका धन्यवाद ! कांटेस्ट जितने के लिए शुभकामना !

    Alka Gupta के द्वारा
    February 5, 2011

    अमित जी , प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

priyasingh के द्वारा
February 4, 2011

रिमझिम फुहारों से भीगा हुआ ये लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा ………. पर ये युसूफ और जुलेखा के प्रेम कहानी के बारे में नही सूना मैंने …….जरुर सुनना चाहूंगी……………….

    alkargupta1 के द्वारा
    February 5, 2011

    प्रियाजी , प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत आभार ! और आपने यूसुफ़ और जुलेखा की प्रेम कहानी नहीं सुनी तो मैं आपको जरूर सुनाऊंगी इस प्रतिक्रिया में संभव नहीं होगा क्योकि विस्तार से ही बताऊंगी शायद अपने अगले ब्लॉग में ही सुना दूं इन्हीं दिनों…..आशा है आप मुझे एक दिन का समय देंगी ,आपने मुझे एक विषय दे दिया है लिखने के लिए बहुत धन्यवाद !

R K KHURANA के द्वारा
February 4, 2011

सुश्री अलका जी, प्यार से सराबोर आपका बहुत अच्छा लेख ! मेरी बधाई १ खुराना

    alkargupta1 के द्वारा
    February 5, 2011

    श्री खुराना जी , अभिवादन प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद !

baijnathpandey के द्वारा
February 4, 2011

आदरणीय अलका जी, प्रेम का इतना सटीक एवं सजीव चित्रण के लिए साधुवाद ….आपकी लेखनी में सम्मोहन है ………बरबस हीं अपनी ओर खींचता है बहुत-२ बधाई

    alkargupta1 के द्वारा
    February 5, 2011

    पाण्डेय जी , आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

rajkamal के द्वारा
February 4, 2011

आदरणीय अलका जी …सादर अभिवादन ! आप को इस प्रतियोगिता में उतरते हुए देख कर हार्दिक खुशी हुई है …. प्यार के बारे में आपके विचार बहुत ही उत्तम है …. प्रेम एक अद्वितीय जीवन संगीत है जिसमें मधुर स्वर लहरियां हैं और जब यह किसी के भी जीवन में संगी-साथी के रूप में प्रवेश करता है तो वहाँ जीवन संगीत समाप्त हो जाता है और बच जाते हैं टूटे-फीते अवयवों के रूप में प्रेम प्रकरण जो अतीत के पृष्ठों में अंकित होकर वर्तमान समय में साध्य और हृदय तंत्रियों से से जुड़े तारों की गाँठ को तोड़ कर दो प्रेमियों को इस संसार के भ्रमजाल में छोड़ जाते हैं…………! किरपा करके इन विचारों को स्पष्ट करने की किरपा करे …. आपका आभारी …. बधाईयाँ व शुभकामनाये कांटेस्ट के लिए

    alkargupta1 के द्वारा
    February 5, 2011

    राजकमल जी , इन पंक्तियों को स्पष्ट करने का प्रयत्न करती हूँ….टूटे-फीते के स्थान पर कृपया \’टूटे-फूटे \’ पढ़ें पोस्ट अपडेट कर दी है !. संगीत के मधुर स्वर जब हम सुनते हैं तो नदी की तरंगों के सामान हमारे हृदय में प्रवेश करते हैं और साथ-साथ हमारा हृदय भी तरंगित होने लगता है हम सब कुछ भूल कर उसी संगीत में रम जाते हैं हमारे आस-पास का वातावरण भी पूर्ण संगीतमय हो जाता है तत्समय असीम आनंदानुभूति होती है उसी तरह यह प्रेम भी हमारे जीवन में संगीत सदृश ही है | अंतर केवल इतना है कि हम संगीत स्वरों के माध्यम से सुनते हैं तब उसके आनंद का अनुभव करते हैं लेकिन इस अद्वितीय प्रेम के संगीत की हमें अपने जीवन में अपने हृदय के अंतर्भावों के माध्यम से सुखद आनंद की अनुभूति होती है एक ऐसे उदात्त प्रेम की भावना जहाँ न कोई स्वार्थ है न कोई लोभ या किसी तरह का लालच , अगर है तो केवल लगाव , तल्लीनता , सम्मान और पूर्ण समर्पण का भाव ! इन सबका मिश्रण ही अद्वितीय प्रेम का संगीत है जिसकी रसानुभूति से आस-पास का वातावरण यहाँ तक कि सम्पूर्ण जीवन ही रसमय हो जाता है और जब यह एक दूसरे के हृदय में जीवनसाथी के रूप में प्रवेश करता है तब ही सही रूप के दर्शन होते हैं कि यह सच्चा प्रेम है कहीं भावनाओं के साथ कोई खिलवाड़ तो नहीं! दोनों प्रेमी जीव एक दूसरे की वास्तविक ज़िंदगी में प्रवेश करते हैं तो इस कठिन राह पर चलते-चलते कहीं न कहीं थोडा बहुत जब स्वार्थ या लोभ घर कर जाता है तब जीवन संगीत के मधुर स्वर कहीं लुप्त हो जाते हैं और प्रेम प्रकरण खंडित होकर ( यहाँ अवयवों के रूप से तात्पर्य \’ तारतम्य अर्थात घट-बढ़ का भाव\’ से है क्योकि जैसा कि मेने कहा है कि प्रेम का कोई अवयव नहीं होता ) वर्तमान में मात्र समय साध्य बनकर ( समयानुसार आज के परिप्रेक्ष्य में अपने को सफल सिद्ध करने के लिए )अपने इतिहास का स्मरण कराते हैं तत्पश्चात ये दोनों प्रेमी जीव इस संसार के भ्रमजाल में फंस जाते हैं जीवन की वास्तविकता से साक्षात्कार करने के लिए | इसके अपवाद भी हैं और आज भी पवित्र , वासनामुक्त व उदात्त प्रेम है…..!

    alkargupta1 के द्वारा
    February 5, 2011

    राजकमल जी , शायद अब आपको मेरे ये विचार स्पष्ट हो गए होंगे | कुछ और पंक्तियों का अगर स्पष्टीकरण चाहें तो कृपया अवगत कराएं बहुत ही अच्छा लगा पहली बार आपकी ऐसी प्रतिक्रिया को पढ़कर | किसी अन्य स्पष्टीकरण के लिए आपका पुनः स्वागत है | प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत धन्यवाद !

rachna varma के द्वारा
February 4, 2011

अलका जी नमस्कार , गजब की प्रस्तुति ! इतना विस्तृत और प्रेम रस में सराबोर कर देने वाले आलेख के लिए आपकी जितनी भी तारीफ की जाये कम है आप इसी तरह से लिखती रहिये अपने कलम का जादू जगाये रखिये | धन्यवाद !

    alkargupta1 के द्वारा
    February 5, 2011

    रचना जी , नमस्कार सराहना के लिए आपका बहुत धन्यवाद !अगर आप सभी का स्नेह मिलता रहे तो कोशिश जारी रहेगी ! प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत धन्यवाद !

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 4, 2011

नमस्कार अलका जी….. आखिर आप भी इस फुहार का आनंद लेने कूद ही पड़ी….. आपका स्वागत है….. सुंदर प्रवाहपूर्ण आलेख….

    alkargupta1 के द्वारा
    February 5, 2011

    हिमांशु जी , ये फुहारें ऐसी हैं कि इनसे बच्चा ,बालक , बूढा , जवान कोई भी नहीं बच सकता अन्यथा तो जीवन में संगीतमय मधुरता ही नहीं रहेगी ! प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत आभार !

roshni के द्वारा
February 4, 2011

alka जी.. बहुत बढ़िया कहा आपने… पोथी पढ़ पढ़ जगा मुआ पंडित भय न कोई ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए धन्यवाद सहित

    alkargupta1 के द्वारा
    February 5, 2011

    रोशनी जी , प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत आभार !

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 4, 2011

आदरणीया अलका जी, मेरे दृष्टिकोण में प्रेम की परिभाषा देना बहुत ही दुष्कर कार्य है पर आपने जो व्याख्या की है यहाँ वो बहुत ही सुन्दर और मनभावन है|प्रेम तो विजेता है ही| आभार सहित,

    alkargupta1 के द्वारा
    February 5, 2011

    वाहिद जी , आपका कहना बिलकुल सही है इसका बहुत ही विस्तृत रूप है सर्वव्यापी है इसकी कोई भी परिभाषा नहीं दी जा सकती| मेरे विचारों के समर्थन के लिए आपका बहुत धन्यवाद !

nishamittal के द्वारा
February 4, 2011

अलका जी, सत्यम,शिवम सुन्दरम ढाई आखर प्रेम पर आपकी बहुत सुंदर प्रस्तुति. बधाई,.शुभकामनाएं प्रेम जैसे शाश्वत विषय पर जितना भी लिखा जाए कम है,लेकिन किसी भी रूप में सभी को इस पवित्र भावना की अनुभूति अवश्य होती है.

    alkargupta1 के द्वारा
    February 5, 2011

    निशाजी , मुझे लगा कि आपने अपनी कसौटी पर इस पवित्र प्रेम की अभिव्यक्ति को सही पाया ! बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत धन्यवाद !

deepak pandey के द्वारा
February 4, 2011

अलका जी , प्रेम ही सत्य है बाकि सब मिथ्या . इस पृथ्वी पर जीवन भी किसी के प्रेम की वजह से है और यह इस प्रेम की वजह स चल रही है. ऐसे में आपका ये लेख मन को भिगो गया.

    alkargupta1 के द्वारा
    February 5, 2011

    दीपक जी , इस ढाई अक्षर वाले शब्द में इतनी शक्ति होती है कि हर प्राणी का जीवन यहाँ तक कि सारी प्रकृति भी इसके संगीत में सराबोर हो जाती है ! प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत आभार !

allrounder के द्वारा
February 4, 2011

अलका जी, नमस्कार प्रेम की बेहतरीन गंगा बहाने के लिए बधाई और प्रतियोगिता के लिए शुभकामनायें !

    alkargupta1 के द्वारा
    February 5, 2011

    सचिन जी , प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत आभार |


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