sahity kriti

man ke udgaaron ki abhivyakti

89 Posts

2874 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3412 postid : 662

भेड़ें और भेड़िये.......'हरिशंकर परसाई जी' की लेखनी से व्यंग्य रचना

  • SocialTwist Tell-a-Friend

सुधी ब्लॉगर साथियों, आज मैं आप सबके समक्ष हिन्दी जगत के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार `श्री हरिशंकर परसाई जी ‘ की रचना प्रस्तुत कर रही हूँ | प्रतीकात्मक शैली में लिखा गया यह एक ऐसा तीखा व्यंग्य है जो कि प्रजातंत्र के नाम पर स्वार्थी, ढोंगी और चालाक राजनेता सीधे-सादे लोगों का शोषण करते हैं| इसके लिए वे कवियों-लेखकों जैसे बुद्धिजीवियों का सहारा लेते हैं……….! शायद आप सबको भी `परसाई जी’ का यह व्यंग्य पसंद आये और कुछ सोचने को विवश करे अपने देश के राजनेताओं के बारे में भी…… !
—————————————————————————————————————————————————————
एक बार एक वन के पशुओं को ऐसा लगा कि वे सभ्यता के उस स्तर पर पहुँच गए हैं, जहाँ उन्हें एक अच्छी शासन-व्यवस्था अपनानी चाहिए | और,एक मत से यह तय हो गया कि वन-प्रदेश में प्रजातंत्र की स्थापना हो | पशु-समाज में इस `क्रांतिकारी’ परिवर्तन से हर्ष की लहर दौड़ गयी कि सुख-समृद्धि और सुरक्षा का स्वर्ण-युग अब आया और वह आया |
—————————————————————————————————————————————————————–
जिस वन-प्रदेश में हमारी कहानी ने चरण धरे हैं,उसमें भेंडें बहुत थीं–निहायत नेक , ईमानदार, दयालु , निर्दोष पशु जो घास तक को फूँक-फूँक कर खाता है |
——————————————————————————————————————————————————————-
भेड़ों ने सोचा कि अब हमारा भय दूर हो जाएगा | हम अपने प्रतिनिधियों से क़ानून बनवाएँगे कि कोई जीवधारी किसी को न सताए, न मारे | सब जिएँ और जीने दें | शान्ति,स्नेह,बन्धुत्त्व और सहयोग पर समाज आधारित हो |
——————————————————————————————————————————————————————-
इधर, भेड़ियों ने सोचा कि हमारा अब संकटकाल आया | भेड़ों की संख्या इतनी अधिक है कि पंचायत में उनका बहुमत होगा और अगर उन्होंने क़ानून बना दिया कि कोई पशु किसी को न मारे, तो हम खायेंगे क्या? क्या हमें घास चरना सीखना पडेगा?
——————————————————————————————————————————————————————
ज्यों-ज्यों चुनाव समीप आता, भेड़ों का उल्लास बढ़ता जाता |
ज्यों-ज्यों चुनाव समीप आता, भेड़ियों का दिल बैठता जाता |
एक दिन बूढ़े सियार ने भेड़िये से कहा,“मालिक, आजकल आप बड़े उदास रहते हैं |”
—————————————————————————————————————————————————————–
हर भेड़िये के आसपास दो – चार सियार रहते ही हैं | जब भेड़िया अपना शिकार खा लेता है, तब ये सियार हड्डियों में लगे माँस को कुतरकर खाते हैं,और हड्डियाँ चूसते रहते हैं | ये भेड़िये के आसपास दुम हिलाते चलते हैं, उसकी सेवा करते हैं और मौके-बेमौके “हुआं-हुआं ” चिल्लाकर उसकी जय बोलते हैं |
——————————————————————————————————————————————————————
तो बूढ़े सियार ने बड़ी गंभीरता से पूछा, “महाराज, आपके मुखचंद्र पर चिंता के मेघ क्यों छाये हैं?” वह सियार कुछ कविता भी करना जानता होगा या शायद दूसरे की उक्ति को अपना बनाकर कहता हो |
ख़ैर, भेड़िये ने कहा,“ तुझे क्या मालूम नहीं है कि वन-प्रदेश में नई सरकार बनने वाली है? हमारा राज्य तो अब गया |
सियार ने दांत निपोरकर कहा,“ हम क्या जानें महाराज ! हमारे तो आप ही `माई-बाप’ हैं | हम तो कोई और सरकार नहीं जानते| आपका दिया खाते हैं, आपके गुण गाते हैं ”
भेड़िये ने कहा, “ मगर अब समय ऐसा आ रहा है कि सूखी हड्डियां भी चबाने को नहीं मिलेंगी |”
सियार सब जानता था, मगर जानकार भी न जानने का नाटक करना न आता, तो सियार शेर न हो गया होता !
——————————————————————————————————————————————————————
आखिर भेड़िये ने वन-प्रदेश की पंचायत के चुनाव की बात बूढ़े सियार को समझाई और बड़े गिरे मन से कहा, “ चुनाव अब पास आता जा रहा है | अब यहाँ से भागने के सिवा कोई चारा नहीं | पर जाएँ भी कहाँ ?”
सियार ने कहा, “ मालिक, सर्कस में भरती हो जाइए |”
भेड़िये ने कहा, “अरे, वहाँ भी शेर और रीछ को तो ले लेते हैं,पर हम इतने बदनाम हैं कि हमें वहाँ भी कोई नहीं पूछता”
“तो,” सियार ने खूब सोचकर कहा, “ अजायबघर में चले जाइए |”
भेड़िये ने कहा, “ अरे, वहाँ भी जगह नहीं है, सुना है |वहाँ तो आदमी रखे जाने लगे हैं |”
—————————————————————————————————————————————————————-
बूढा सियार अब ध्यानमग्न हो गया | उसने एक आँख बंद की, नीचे के होंठ को ऊपर के दाँत से दबाया और एकटक आकाश की और देखने लगा जैसे विश्वात्मा से कनेक्शन जोड़ रहा हो | फिर बोला,“बस सब समझ में आ गया | मालिक, अगर पंचायत में आप भेड़िया जाति का बहुमत हो जाए तो?”
भेड़िया चिढ़कर बोला, “ कहाँ की आसमानी बातें करता है? अरे हमारी जाति कुल दस फीसदी है और भेड़ें तथा अन्य पशु नब्बे फीसदी |भला वे हमें काहे को चुनेंगे | अरे, कहीं ज़िंदगी अपने को मौत के हाथ सौंप सकती है? मगर हाँ, ऐसा हो सकता तो क्या बात थी !”
————————————————————————————————————————————————————–
बूढा सियार बोला,“ आप खिन्न मत होइए सरकार ! एक दिन का समय दीजिये | कल तक कोई योजना बन ही जायेगी | मगर एक बात है | आपको मेरे कहे अनुसार कार्य करना पड़ेगा |”
मुसीबत में फंसे भेड़िये ने आखिर सियार को अपना गुरु माना और आज्ञापालन की शपथ ली |
दूसरे दिन बूढा सियार अपने तीन सियारों को लेकर आया | उनमें से एक को पीले रंग में रंग दिया था, दूसरे को नीले में और तीसरे को हरे में |
भेड़िये ने देखा और पूछा, “ अरे ये कौन हैं?
बूढा सियार बोला, “ ये भी सियार हैं सरकार, मगर रंगे सियार हैं |आपकी सेवा करेंगे | आपके चुनाव का प्रचार करेंगे |”
भेड़िये ने शंका की,“ मगर इनकी बात मानेगा कौन? ये तो वैसे ही छल-कपट के लिए बदनाम हैं |”
सियार ने भेड़िये का हाथ चूमकर कहा, “ बड़े भोले हैं आप सरकार ! अरे मालिक, रूप-रंग बदल देने से तो सुना है आदमी तक बदल जाते हैं | फिर ये तो सियार हैं |”
————————————————————————————————————————————————————–
और तब बूढ़े सियार ने भेड़िये का भी रूप बदला | मस्तक पर तिलक लगाया, गले में कंठी पहनाई और मुँह में घास के तिनके खोंस दिए | बोला, “ अब आप पूरे संत हो गए | अब भेड़ों की सभा में चलेंगे | मगर तीन बातों का ख्याल रखना– अपनी हिंसक आँखों को ऊपर मत उठाना, हमेशा ज़मीन की ओर देखना और कुछ बोलना मत, नहीं तो सब पोल खुल जायेगी और वहां बहुत-सी भेड़ें आयेंगी, सुन्दर-सुन्दर, मुलायम-मुलायम, तो कहीं किसी को तोड़ मत खाना |”
———————————————————————————————————————————————————–
भेड़िये ने पूछा, “ लेकिन रंगे सियार क्या करेंगे?ये किस काम आयेंगे?”
बूढा सियार बोला,“ ये बड़े काम के हैं | आपका सारा प्रचार तो यही करेंगे | इन्हीं के बल पर आप चुनाव लड़ेंगे | यह पीला वाला सियार बड़ा विद्वान है ,विचारक है ,कवि भी है,और लेखक भी | यह नीला सियार नीला और पत्रकार है | और यह हरा धर्मगुरु | बस, अब चलिए |”
———————————————————————————————————————————————————-
“ ज़रा ठहरो,” भेड़िये ने बूढ़े सियार को रोका, “ कवि, लेखक, नेता, विचारक– ये तो सुना है बड़े अच्छे लोग होते हैं | और ये तीनों……..”
बात काटकर सियार बोला, “ ये तीनों सच्चे नहीं हैं, रंगे हुए हैं महाराज ! अब चलिए देर मत करिए |”
और वे चल दिए | आगे बूढा सियार था, उसके पीछे रंगे सियारों के बीच भेड़िया चल रहा था– मस्तक पर तिलक, गले में कंठी, मुख में घास के तिनके | धीरे-धीरे चल रहा था, अत्यंत गंभीरतापूर्वक, सर झुकाए विनय की मूर्ति !
————————————————————————————————————————————————————-

उधर एक स्थान पर सहस्रों भेंड़ें इकट्ठी हो गईं थीं, उस संत के दर्शन के लिए, जिसकी चर्चा बूढ़े सियार ने फैला रखी थी |
चारों सियार भेड़िये की जय बोले हुए भेड़ों के झुण्ड के पास आए| बूढ़े सियार ने एक बार जोर से संत भेड़िये की जय बोली ! भेड़ों में पहले से ही यहाँ-वहाँ बैठे सियारों ने भी जयध्वनि की |
भेड़ों ने देखा तो वे बोलीं, “ अरे भागो, यह तो भेड़िया है |”
—————————————————————————————————————————————————————
तुरंत बूढ़े सियार ने उन्हें रोककर कहा, “ भाइयों और बहनों ! अब भय मत करो| भेड़िया राजा संत हो गए हैं | उन्होंने हिंसा बिलकुल छोड़ दी है | उनका `हृदय परिवर्तन हो गया है | वे आज सात दिनों से घास खा रहे हैं | रात-दिन भगवान के भजन और परोपकार में लगे रहते हैं | उन्होंने अपना जीवन जीव-मात्र की सेवा में अर्पित कर दिया है | अब वे किसी का दिल नहीं दुखाते, किसी का रोम तक नहीं छूते |भेड़ों से उन्हें विशेष प्रेम है | इस जाति ने जो कष्ट सहे हैं,उनकी याद करके कभी-कभी भेड़िया संत की आँखों में आँसू आ जाते हैं | उनकी अपनी भेड़िया जाति ने जो अत्याचार आप पर किये हैं उनके कारण भेड़िया संत का माथा लज्जा से जो झुका है, सो झुका ही हुआ है | परन्तु अब वे शेष जीवन आपकी सेवा में लगाकर तमाम पापों का प्रायश्चित्त करेंगे | आज सवेरे की ही बात है कि एक मासूम भेड़ के बच्चे के पाँव में काँटा लग गया, तो भेड़िया संत ने उसे दाँतों से निकाला, दाँतों से ! पर जब वह बेचारा कष्ट से चल बसा, तो भेदिया संत ने सम्मानपूर्वक उसकी अंत्येष्टि-क्रिया की | उनके घर के पास जो हड्डियों का ढेर लगा है, उसके दान की घोषणा उन्होंने आज सवेरे ही की | अब तो वह सर्वस्व त्याग चुके हैं | अब आप उनसे भय मत करें | उन्हें अपना भाई समझें | बोलो सब मिलकर, संत भेड़िया जी की जय !”
——————————————————————————————————————————————————–
भेड़िया जी अभी तक उसी तरह गर्दन डाले विनय की मूर्ती बने बैठे थे |बीच में कभी-कभी सामने की ओर इकट्ठी भेड़ों को देख लेते और टपकती हुई लार को गुटक जाते |
——————————————————————————————————————————————–
बूढा सियार फिर बोला, “ भाइयों और बहनों, में भेड़िया संत से अपने मुखारविंद से आपको प्रेम और दया का सन्देश देने की प्रार्थना करता पर प्रेमवश उनका हृदय भर आया है, वह गदगद हो गए हैं और भावातिरेक से उनका कंठ अवरुद्ध हो गया है | वे बोल नहीं सकते | अब आप इन तीनों रंगीन प्राणियों को देखिये | आप इन्हें न पहचान पाए होंगे | पहचानें भी कैसे? ये इस लोक के जीव तो हैं नहीं | ये तो स्वर्ग के देवता हैं जो हमें सदुपदेश देने के लिए पृथ्वी पर उतारे हैं | ये पीले विचारक हैं,कवि हैं, लेखक हैं | नीले नेता हैं और स्वर्ग के पत्रकार हैं और हरे वाले धर्मगुरु हैं | अब कविराज आपको स्वर्ग-संगीत सुनायेंगे | हाँ कवि जी …….”
————————————————————————————————————————————————————————
पीले सियार को `हुआं-हुआं ‘ के सिवा कुछ और तो आता ही नहीं था | `हुआं-हुआं चिल्ला दिया |शेष सियार भी `हुआं-हुआं’ बोल पड़े | बूढ़े सियार ने आँख के इशारे से शेष सियारों को मना कर दिया और चतुराई से बात को यों कहकर सँभाला,“ भई कवि जी तो कोरस में गीत गाते हैं | पर कुछ समझे आप लोग? कैसे समझ सकते हैं? अरे, कवि की बात सबकी समझ में आ जाए तो वह कवि काहे का? उनकी कविता में से शाश्वत के स्वर फूट रहे हैं | वे कह रहे हैं की जैसे स्वर्ग में परमात्मा वैसे ही पृथ्वी पर भेड़िया | हे भेड़िया जी, महान ! आप सर्वत्र व्याप्त हैं, सर्वशक्तिमान हैं | प्रातः आपके मस्तक पर तिलक करती है, साँझ को उषा आपका मुख चूमती है , पवन आप पर पंखा करता है और रात्रि को आपकी ही ज्योति लक्ष-लक्ष खंड होकर आकाश में तारे बनकर चमकती है | हे विराट ! आपके चरणों में इस क्षुद्र का प्रणाम है |”
——————————————————————————————————————————————————————
फिर नीले रंग के सियार ने कहा, “ निर्बलों की रक्षा बलवान ही कर सकते हैं | भेड़ें कोमल हैं, निर्बल हैं, अपनी रक्षा नहीं कर सकतीं | भेड़िये बलवान हैं, इसलिए उनके हाथों में अपने हितों को छोड़ निश्चिन्त हो जाओ, वे भी तुम्हारे भाई हैं | आप एक ही जाति के हो | तुम भेड़ वह भेड़िया | कितना कम अंतर है ! और बेचारा भेड़िया व्यर्थ ही बदनाम कर दिया गया है कि वह भेड़ों को खाता है | अरे खाते और हैं, हड्डियां उनके द्वार पर फेंक जाते हैं | ये व्यर्थ बदनाम होते हैं | तुम लोग तो पंचायत में बोल भी नहीं पाओगे | भेड़िये बलवान होते हैं | यदि तुम पर कोई अन्याय होगा, तो डटकर लड़ेंगे | इसलिए अपने हित की रक्षा के लिए भेडियों को चुनकर पंचायत में भेजो| बोलो संत भेड़िया की जय !”
———————————————————————————————————————————————————-
फिर हरे रंग के धर्मगुरु ने उपदेश दिया, “ जो यहाँ त्याग करेगा, वह उस लोक में पाएगा | जो यहाँ दुःख भोगेगा, वह वहां सुख पाएगा | जो यहाँ राजा बनाएगा, वह वहाँ राजा बनेगा | जो यहाँ वोट देगा, वह वहाँ वोट पाएगा | इसलिए सब मिलकर भेड़िये को वोट दो | वे दानी हैं, परोपकारी हैं, संत हैं | में उनको प्रणाम करताहूं |”
———————————————————————————————————————————————————-
यह एक भेड़िये की कथा नहीं है, सब भेड़ियों की कथा है | सब जगह इस प्रकार प्रचार हो गया और भेड़ों को विश्वास हो गया कि भेड़िये से बड़ा उनका कोई हित-चिन्तक और हित-रक्षक नहीं है |
और, जब पंचायत का चुनाव हुआ तो भेड़ों ने अपने हित- रक्षा के लिए भेड़िये को चुना |
और, पंचायत में भेड़ों के हितों की रक्षा के लिए भेड़िये प्रतिनिधि बनकर गए | और पंचायत में भेड़ियों ने भेड़ों की भलाई के लिए पहला क़ानून यह बनाया —-
हर भेड़िये को सवेरे नाश्ते के लिए भेड़ का एक मुलायम बच्चा दिया जाए , दोपहर के भोजन में एक पूरी भेड़ तथा शाम को स्वास्थ्य के ख्याल से कम खाना चाहिए, इसलिए आधी भेड़ दी जाए |

—————————–********————————-



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (11 votes, average: 4.91 out of 5)
Loading ... Loading ...

35 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

शिवकुमार के द्वारा
May 17, 2016

लगता है परसाई जी ये कहानी वर्तमान राजनीतिक परिस्थिती के लिये लिखा है. सारे नेता और धर्मगुरू भेडि़ये के प्रतिक है.

vikash के द्वारा
August 14, 2011

कांग्रेस ने तीनो टायप के सियार पल रखे है ,पर नीला वाला कुछ ज्यादा ही है . बहुत अच्छी प्रस्तुति .

    alkargupta1 के द्वारा
    August 16, 2011

    विकास जी , पारसी जी की यह रचना कालजयी व प्रासंगिक भी है आज के पारिदृश्य में और आपने भी इसका समर्थन किया कि कांग्रेस में भी नीले सियार की बहुलता है प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

संदीप कौशिक के द्वारा
May 18, 2011

आदरणीया अल्का जी, रचना को समय देने के लिए आपका आभार !! रचना पर प्रतिक्रियाएँ तो मिल रही हैं, हो सकता है किसी तकनीकी खराबी की वजह से आपको ऐसी असुविधा का सामना करना पड़ रहा हो !! कृप्या पुनः प्रयास कीजिए, हो सकता है दिक्कत न आए | कुछ दिन पहले मुझे भी इसी असुविधा से दो-चार होना पड़ा था लेकिन कुछ देर बाद ये दिक्कत स्वतः दूर हो गयी थी | साभार… संदीप कौशिक

    संदीप कौशिक के द्वारा
    May 20, 2011

    आदरणीया अल्का जी, क्या आप कृप्या बता सकती हैं कि क्या दिक्कत आ रही है ?? आपके अलावा किसी भी आदरणीय+स्नेही ब्लॉगर से ऐसी कोई बात सामने नहीं आई | :( फिर भी अगर….ये असुविधा बनी ही रहती है, तो आप अपना आशीर्वाद मुझ नादान तक e-mail के द्वारा भी भेज सकती हैं | आपका आशीर्वाद एवं मार्ग-दर्शन मेरे लिए पूजनीय है | मेरी कोशिश ही नहीं बल्कि आपसे वादा है कि आपकी हर प्रतिक्रिया का मैं ससम्मान जवाब दूंगा | हो सकता है कि कुछ समय बाद ये असुविधा न आए……तब तक…. sandeepkaushik36@gmail.com . . आपकी प्रतिक्रिया/आशीर्वाद के इंतज़ार में….. आपका संदीप कौशिक

    alkargupta1 के द्वारा
    May 20, 2011

    संदीप जी , आज पुनः आपकी पोस्ट पर जाकर प्रयत्न करती हूँ अगर मेरा प्रयास सफल रहा तब तो बहुत अच्छा है अन्यथा फिर देखते हैं किसी भी तरह से प्रतिक्रिया पहुँचाने का प्रयत्न करूंगी | मेरी ही पोस्ट से दो बार उत्तर देने के लिए बहुत बहुत आभार ! आपकी जागरूकता देखकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई धन्यवाद !

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    May 24, 2011

    संदीप जी, आप अपने खाते में डिस्कशन सेटिंग में जाकर user must be logged in to post a comment को अनचेक करें अलका जी की समस्या का समाधान हो जाएगा| ******************************** आदरणीया अलका जी, सादर अभिवादन, जिस प्रकार से आप अपना लेख या कविता को पोस्ट करते समय करते समय अपने जे जे खाते में लोगिन रहती हैं उसी समय यदि अपनी कमेंट्स पोस्ट करें तो संभव होगा| साभार,

    alkargupta1 के द्वारा
    May 25, 2011

    वाहिद जी , समस्या का समाधान करने व उचित मार्ग दर्शन करने हेतु आपकी बहुत आभारी हूँ ! आपकी रचनाओं की प्रतीक्षा है ! धन्यवाद

Aakash Tiwaari के द्वारा
May 12, 2011

आदरणीय अलका जी, इस उच्चकोटि की रचना को हमतक पहुचाने के लिए आपका धन्यवाद….मै शायद परसाई जी की ये पहली रचना पढ़ रहा हूँ… आकाश तिवारी

    Alka Gupta के द्वारा
    May 12, 2011

    आकाश जी , अब आप कैसे हैं आशा करती हूँ अब आप ईश्वर की कृपा से पूर्ण रूप से स्वस्थ व प्रसन्न होंगे | रचना पढने के लिए आपको मेरा हार्दिक आभार !

rachna varma के द्वारा
May 11, 2011

आदरणीय अलका जी , उच्च -कोटि के व्यंगकार श्री परसाई जी को आपके माध्यम से इस मंच पर देखना सुकून देता है | धन्यवाद |

    Alka Gupta के द्वारा
    May 11, 2011

    रचना जी, परसाई जी की रचना पढने के लिए आपको मेरा हार्दिक आभार !

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 10, 2011

आदरणीय अलका जी ….सादर अभिवादन ! वैसे तो मेरा असल काम क्या है आप जानती ही है …. लेकिन क्योंकि यह रचना आपकी नहीं है इसलिए इस बार की कमी अगली बार ….. इस समय तो इस उत्कृष्ट रचना पर आपको सिर्फ धन्यवाद देते हुए आभार ही प्रकट कर सकता हूँ … :) ;) :D :(

    Alka Gupta के द्वारा
    May 11, 2011

    राजकमल जी,मेरे सहित मंच का हर सदस्य आपके असल काम से वाकिफ है और यह हर कोई जनता भी है यहाँ पर | मैंने साहित्य जगत के सुप्रसिद्ध महान व्यंग्यकार का नाम व उनकी रचना का शीर्षक तो सर्व प्रथम ही दे दिया है क्योंकि यह मेरी रचना नहीं है और उनकी इस रचना में मेरा एक शब्द भी कहीं किसी भी स्थान पर नहीं जोड़ा गया है और फिर ऐसी धृष्टता इतने महान व्यक्तित्त्व के साथ जीवन में कभी भी नहीं कर सकती कई बार यह व्यंग्य मैने अपने दसवीं कक्षा के छात्रों को पढाया था तो लगा कि श्री परसाई जी के इस लेख में कितनी प्रासंगिकता है उनकी अधिकाँश रचनाएँ कालजयी हैं तो सोचा आप सबके लिए इस प्रासंगिक उत्कृष्ट व्यंग्य को मंच पर उन्हीं के शब्दों में प्रस्तुत कर दूं इस रचना की प्रस्तुति पर धन्यवाद देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

rahulpriyadarshi के द्वारा
May 10, 2011

नमस्कार अल्काजी,वर्षो पहले अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ा था,किन्तु इतने दिनों के बाद एक बार फिर यह रचना पढने को मिली,बहुत अच्छा लगा,यह रचना वास्तव में कालजयी है,एवं प्रासंगिक भी.इसे इस मंच पर प्रस्तुत करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

    Alka Gupta के द्वारा
    May 11, 2011

    राहुल जी , परसाई जी की इस रचना के साथ अपने विचार साझा करने के लिए आपको मेरा हार्दिक आभार !

वाहिद काशीवासी के द्वारा
May 10, 2011

आदरणीया अलका जी, सादर अभिवादन, वर्षों पूर्व ये कथा पढ़ी थी| आज भी परसाई जी की अनेक पुस्तकें रखी हैं जिन्हें समय मिलने पर अवश्य दोहराता रहता हूँ| आज इसे यहाँ प्रस्तुत कर के आपने कृतार्थ कर दिया| उनकी रचनाएँ अपने रचे जाने के वक़्त जितनी प्रासंगिक थीं उतनी ही आज भी हैं, बल्कि आज उनका महत्व कही अधिक है तब की तुलना में| इसे ही कहते हैं कालजयी व युगद्रष्टा रचनाकार| परसाई जी हिंदी व्यंग्य के सशक्त और सबसे दृढ़ हस्ताक्षर थे, जब पहली बार उन्हें पढ़ा था तभी से वो मेरे प्रेरणास्रोत बन गए थे| आप लोगों की सेवा में मैं भी पहले उनकी दो रचनाएँ प्रस्तुत कर चुका हूँ इस मंच पर फिर कभी कोई अवसर प्राप्त हुआ तो अवश्य ही ऐसा दुस्साहस पुनः करूँगा| धन्यवाद सहित,

    Alka Gupta के द्वारा
    May 11, 2011

    वाहिद जी, बहुत ही अच्छा कहा है आपने कि परसाई जी कालजयी व युगदृष्टा रचनाकार थे तभी तो उनकी रचनाएँ आज भी सत्यता की प्रतीक व प्रासंगिक हैं और आपके तो वे प्रेरणास्रोत हैं सुनकर बहुत ही गर्व हो रहा है मुझे आप पर ! आपकी रचनाएँ पढने के लिए सदैव प्रतीक्षा रहती है आप ही द्वारा प्रस्तुत परसाई जी की रचनाएँ पूर्व में पढने को मिलीं थी बहुत ही आनंदित हुई थी….और आजकल आपका कुछ भी पढने को नहीं मिल पा रहा है…. पुनः आपकी किसी नयी रचना के आने का मंच पर प्रतीक्षा है आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

abodhbaalak के द्वारा
May 10, 2011

Aadarneey Alka ji bade hi gahre arth hai is poori rachna ke, Parsaai ji ke is rachna ne to mohit kar lia, ab to unhe dhoondh dhoondh kar padhna padega …. aapse sada uchch koti ki rachnaao ki hi aapeksha rahti hai aur aap kabhi bhi niraash nahi karti hain … http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Alka Gupta के द्वारा
    May 11, 2011

    अबोध जी, आपकी प्रतिक्रिया सदैव हौसला को बढ़ावा देती है परसाई जी की रचनाओं को जितना अधिक पढ़ते जाते हैं उतनी ही गहराई तक पहुँचते जाते हैं उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपको मेरा हार्दिक आभार !

R K KHURANA के द्वारा
May 10, 2011

सुश्री अलका जी, परसाई जी के बारे में जितना कहा जय थोडा है ! उनके व्यंग तो जग प्रसिद्ध है ! राम कृष्ण खुराना

    Alka Gupta के द्वारा
    May 11, 2011

    आदरणीय खुराना जी, सादर अभिवादन परसाई जी के इस व्यंग्य पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद !

narayani के द्वारा
May 10, 2011

नमस्कार अलकाजी श्री परसाई जी की यह रचना बहुत ही गूढ़ अर्थ रखती है तलवार से ज्यादा ताकत कलम में है . बहुत धन्यवाद नारायणी

    Alka Gupta के द्वारा
    May 11, 2011

    नारायणी जी, आपकी इतनी बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

Deepak Sahu के द्वारा
May 10, 2011

बहुत अच्छी रचना है ये हरिशंकर परसाई जी की! अलका जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद की आपकी वजह से हमें यह रचना पढने को मिली! दीपक साहू

    Alka Gupta के द्वारा
    May 11, 2011

    दीपक जी , प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

संदीप कौशिक के द्वारा
May 10, 2011

अल्का जी, सादर अभिवादन !! हरिशंकर परसाई जी की ये व्यंग्य रचना हमारे 9वीं कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल थी | उस दौरान भी इसे पढ़ना अच्छा लगता था पर शायद तब इसके पीछे छिपा गूढ़ व्यंग्य समझ में नहीं आता था | लेकिन आज आपने इसे इस मंच पर रखकर इसके मर्म को समझा दिया है | आदरणीया निशा जी तरह मैं भी यही कहूँगा की इस रचना पर कोई भी प्रतिक्रिया देने के स्तर तक तो शायद मैं नहीं पहुंचा हूँ लेकिन इसे साझा करने के लिए आपका धन्यवाद जरूर करना चाहूँगा | साभार !! http://sandeepkaushik.jagranjunction.com/

    Alka Gupta के द्वारा
    May 11, 2011

    संदीप जी, परसाई जी की यह व्यंग्य रचना आज भी हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल है आपने रचना को पढ़ा और इसके मर्म को समझ लिया मुझे जानकार बहुत ही अच्छा लगा अपने विचारों को हमारे साथ साझा करने के लिए हार्दिक आभार !

nishamittal के द्वारा
May 10, 2011

अलका जी,बहुत दिन बाद आपके द्वारा प्रस्तुत पारसाई जी की व्यंग्य रचना पढी,उनके लेख पर तो मैं कमेन्ट देने की सामर्थ्य नहीं रखती हाँ आपको बधाई व धन्यवाद मंच पर यह व्यंग्य रचना साझा करने के लिए.

    Alka Gupta के द्वारा
    May 11, 2011

    निशा जी, बहुत ही अच्छी बात कही है आपने परसाई जी जैसे व्यंग्य हस्ताक्षर की किसी भी रचना पर हम और आप कोई भी कमेन्ट देने की सामर्थ्य नहीं रखते है बस उनकी रचना के गूढार्थ को समझने की कोशिश ही कर सकते हैं….शायद आज हमारे देश की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है……..उनकी रचना पढने व प्रतिक्रिया देने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद !

    nishamittal के द्वारा
    May 26, 2011

    रचना पढना मेरा सौभाग्य है अलका जी.धन्यवाद आपका है.

shuklabhramar5 के द्वारा
May 10, 2011

आदरणीया अलका जी नमस्कार -आज के इस दौर में हरिशंकर जी की रचना को आप के द्वारा इस मंच पर लाना -बहुत ही श्रेयस्कर कार्य है -बहुत सुन्दर लगा -हृदय को छू लेने वाला लेख -बड़ी मेहनत आप की -इस संकलन के लिए- जे.जे. को इस तरह की कृतियों को अच्छा समय देना चाहिए -और हमारे सभी प्रबुद्ध वर्ग से अनुरोध है की इस में जैसा की कवि+लेखक+पत्रकार के बारे में बताया गया है अपने योगदान को सही तौर पर प्रयुक्त करें -निम्न भेड़ियों का प्रयोग और चाल बहुत कुछ हमें भी बताती है – ये पीले विचारक हैं,कवि हैं, लेखक हैं | नीले नेता हैं और स्वर्ग के पत्रकार हैं और हरे वाले धर्मगुरु हैं | अब कविराज आपको स्वर्ग-संगीत सुनायेंगे सारा लेख हमारी आँख खोल देने वाला है -अब भी लोग -हम सभी भेंड -उसी तरह सोते रहे मूर्ख बने उनकी चाल न समझ सकें -उन्हें ही जितायें -तो निम्न सी स्थिति के लिए तैयार रहें और वो भेड़िये हमारी बोटी नोचते रहें और पंचायत में भेड़ियों ने भेड़ों की भलाई के लिए पहला क़ानून यह बनाया —- हर भेड़िये को सवेरे नाश्ते के लिए भेड़ का एक मुलायम बच्चा दिया जाए , दोपहर के भोजन में एक पूरी भेड़ तथा शाम को स्वास्थ्य के ख्याल से कम खाना चाहिए, इसलिए आधी भेड़ दी जाए | सार्थक लेख के लिए बधाई

    Alka Gupta के द्वारा
    May 11, 2011

    शुक्ला जी,इस रचना के लिए आपने इतनी लम्बी, महत्त्वपूर्ण व सकारात्मक प्रतिक्रिया दी बहुत अच्छा लगा आज हम सब अपनी ऐसी दुर्दशा के लिए तो स्वयं ही ज़िम्मेदार हैं….. यदि हम यह चाहते हैं कि हमें बलि का बकरा न बनाया जाए तो भविष्य में अपने को सुधारना ही होगा ! श्री परसाई जी की हर रचना में व्यंग्यात्मक रूप से गहन भाव अंतर्निहित हैं ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ !

Neeraj के द्वारा
May 10, 2011

हरिशंकर जी ने बहुत ही रोचक अंदाज में आज के प्रजातंत्र पर कटाक्ष किया है ……..ये भेड़े आम जनता है, सियार नौकरशाह है और भेड़िये नेता है …..सचमुच आज देश भी इन सियारों और नेताओ की मिलीभगत से लुट रहा है …….एक अच्छी रचना का चुनाव करने के लिये आपको बधाई………!

    Alka Gupta के द्वारा
    May 11, 2011

    नीरज जी, परसाई जी की इस रचना को पढने के लिए बहुत धन्यवाद ! उनकी हर रचना आज भी उतनी ही प्रासंगिक व महत्त्वपूर्ण है जितनी उस समय !आपको मेरा हार्दिक आभार !


topic of the week



latest from jagran