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मानव प्रकृति और फाल्स सीलिंग.....!

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कभी व्यक्तिगत व्यस्तता ,कभी यात्रायें ,कभी लैप टॉप की आकस्मिक अस्वस्थता तो कभी नेट के नाज़ नखरे और कभी निर्माणाधीन आशियाने का निरीक्षण सब कुल मिला कर ये ही सब कारण थे जिनकी वजह से मैं मंच पर इतने दिनों तक अनुपस्थित रही और लेखनी भी सुप्त रही | और जब अपनी जाग्रत अवस्था में आई तो यह अपने सभी लेखनी मित्रों से कुछ गुफ्तगू करने व मिलने के लिए विकल होने लगी और फिर अवसर पाकर अविलम्ब ही जे जे परिवार के सभी घर- द्वार होती हुई और गवाक्षों से झांकती और हुई दौड़ी-दौड़ी यहाँ तक चली आई और मैं भी सरे राह चलते-चलते कुछ कहने आप सबके पास चली आई……… |
व्यस्तता तो व्यक्ति के जीवन का एक अंग है यह बात अलग है कि हम सब स्वयं को किस तरह और कैसे व्यस्त रखते हैं और हम अपने चतुर्दिक बहुत कुछ ऐसा देखते व सुनते हैं हैं जो कुछ सोचने व विचार करने को विवश करता है…….|
अपने निर्माणाधीन घर के बाथरूम में बनायीं जाने वाली ‘फाल्स सीलिंग’ ( कृत्रिम छत ) को देखा तो कुछ देर तक तो देखती ही रही क्योंकि फाल्स सीलिंग से पहले की छत देखने में अच्छी नहीं लग रही थी क्योंकि वहां लगायी जाने वाली सभी चीज़ें बहुत ही अस्त- व्यस्त थीं जिसे मकान बनाने वाले शिल्पकारों ने सभी कुछ व्यवस्थित करके फाल्स सीलिंग के द्वारा बड़ा ही सुन्दर रूप दे दिया था…… | यहाँ एक प्रश्न मन में उठ रहा है कि क्या मानव प्रकृति भी ऐसी ही है क्या मानव व्यवहार की तुलना इस फाल्स सीलिंग से की जा सकती है…? मेरी दृष्टि में इसका उत्तर सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी | सकारात्मक इसलिए कि कई लोग अपने कृत्रिम व्यवहार द्वारा लोगों को रिझाने या प्रभावित करने का प्रयत्न करते हैं और नकारात्मक इसलिए कि कुछ लोगों के व्यवहार में कृत्रिमता नहीं होती है वाह्य व आतंरिक रूप से सामान ही होते हैं मैंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि दोनों ही वर्ग के लोग मेरे संपर्क में आये हैं और पृथक-पृथक धारणाएं बनी……!|

हमारे जीवन में बहुत से ऐसे व्यक्ति संपर्क में आते हैं जो वाह्य रूप से हर तरह से तो पूर्ण दिखाई देते हैं , जो मृदु और शालीन हैं किन्तु उनके हृदय में कटुता है ….संकीर्णता है…और है स्वार्थीपन…..| यदि ऐसे लोगों की तुलना इसी कृत्रिम छत से की जाये तो कोई अतिश्योक्ति न होगी जो वाह्य रूप से तो देखने में बहुत ही सुन्दर लगते हैं किन्तु अन्दर से अव्यवस्थित और कुरूप | अपने अवगुणों को वे कृत्रिम व्यवहार से छिपाने का प्रयास करते हैं |यदि थोड़ी गहनता से उन्हें परख लिया जाये तो उनके अन्तर्हित अवगुणों की वास्तविकता प्रकाश में आ ही जाती है यह बात अलग है की व्यावहारिकता की दृष्टि से ऐसा बहुत कम ही हो पाता है|
यहाँ हम यह कह सकते हैं कि यदि हमारा व्यक्तित्त्व आतंरिक रूप से व्यवस्थित हैं, दृढ- प्रतिज्ञ और हृदय से शुद्ध हैं ,व्यवहार में कोई भी कृत्रिमता नहीं हैं तो हम लोगों को प्रभावित कर सकते हैं व प्रगाढ़ तथा मधुर सम्बन्ध भी बना सकते हैं और यदि हमारा व्यक्तित्त्व आतंरिक रूप से अव्यवस्थित है.मन में कोई भी दुराव-छिपाव या छल-कपट है और अपने व्यवहार में कृत्रिमता है तो लोगों को प्रभावित करने का या फिर सम्बन्ध बनाने का प्रयास करें तो अत्यल्प समय के लिए ही सफलता मिल सकती है लेकिन जब हमारा रहस्य खुल जाता है तो स्थिति देखते ही बनती है और तुरंत ही उस स्थिति से पलायन करना चाहते हैं …….. हमारे लिए एक मुश्किल खड़ी हो जाती है …….ठीक उसी तरह जैसे कृत्रिम छत बनाते समय अन्दर का कार्य ठीक से न हो तो कभी भी कठिनाई आ सकती है और अन्दर का कार्य ठीक से करने के लिए संयम व कठिन परिश्रम की आवश्यकता होती है जोकि लम्बे समय में उपयोगी होती है | इसी प्रकार व्यक्तित्त्व व व्यवहार को आतंरिक रूप से ठीक करने के लिए संयम और परिश्रम की आवश्यकता होती है और साथ ही वाह्य व्यक्तित्त्व और व्यवहार को भी संवार लिया जाये तो दीर्घकालीन सफलता प्राप्त कर सकते हैं |
यहाँ मेरा ऐसा मानना है कि कृत्रिम व्यवहार को ही अधिक महत्त्व देने वाले व्यक्तियों को दीर्घकाल में इस स्थिति में परिवर्तन की आवश्यकता होती है तभी हम अपने व्यवहार और व्यक्तित्त्व से लोगों को प्रभावित कर सकते हैं उनसे मधुर संबध बना सकते हैं और अपने जीवन के उद्देश्य प्राप्ति में सफल होंगे |
कभी किसी पुस्तक में ( इस समय पुस्तक और लेखक का नाम याद नहीं आ रहा है लेकिन यह वाक्य अवश्य अभी तक स्मरण है ) मैंने यह सत्य उक्ति पढ़ी था
‘ महत्त्वपूर्ण होना अच्छा है , किन्तु अच्छा होना अधिक महत्त्वपूर्ण है |’
तो फिर क्यों न हम अच्छा होने का महत्त्व समझें तांकि जीवन की दीर्घकालीन सफलता प्राप्त कर सकें……! कहते है कि जीव को मानव योनी केवल एक बार ही मिलती है फिर क्यों न हम इस संसार में सम्मानपूर्वक जीयें और सम्मानपूर्वक जीने के लिए हमें वही होना चाहिए जो हम दिखाई दें……!



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73 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ramesh Bajpai के द्वारा
August 2, 2012

जीव को मानव योनी केवल एक बार ही मिलती है फिर क्यों न हम इस संसार में सम्मानपूर्वक जीयें और सम्मानपूर्वक जीने के लिए हमें वही होना चाहिए जो हम दिखाई दें……! आदरणीय अलका बहन बहुत ही सटीक आंकलन | बधाई | इस पोस्ट पर किसी के अनर्गल प्रलाप से मुझे भी पीड़ा हुयी है | किसी भी बहस में शिष्टता व मर्यादा सर्वोपरि है | श्री राज कमल जी इस उत्तरदायित्व का निर्वहन करते आये है ,ख़ुशी है की वे यहाँ भी उपस्थित थे | मै सभी को सावधान करना चाहता हु की बहन बेटियों की पोस्ट \कमेन्ट पर सदा मर्यादा का ख्याल रखा जाय | इनसे किसी प्रकार के अनुचित आचरण के परिणाम का दोषी भुक्त भोगी खुद होगा | रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाओ सहित

getvkfast007 के द्वारा
July 15, 2012

अलका जी नमस्कार छत को आधार मानकर आपका किया गया अवलोकन निश्चित ही मनमोहक`है वास्तव में अगर मानव अपने क्रत्रिम व्यवहार को त्याग तो समाज से आधी बुराई मिट जाये 

    Alka Gupta के द्वारा
    July 15, 2012

    महोदय/महोदय , सर्वप्रथम मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है…. आलेख पर आपके महत्त्वपूर्ण विचारों के लिए आपका हार्दिक आभार मुझे आपका नाम स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कृपया अपने नाम से अवगत कराएँ . धन्यवाद

hemchand tiwary के द्वारा
June 27, 2012

Alka ji, at first i want to give you a hearty congratulation that you put forward such an issue which no one had done before in such a straight manner and whatever you want to make the society aware of i think your column contains all those things. But i just want to make a point that in english there is a famous proverb “First Impression is the last impression”, so how can you justify your column with this proverb. I am completely agree with the point which you raised in the column but in our daily life we meet numerous persons and obviously on most of the time we judge that person on their behaviour and nature what they act on that meeting, and not only myself i think in the daily life you also have to handle such situation. For example, let i meet you somewhere and i am in a deep frustration because of some incident i just gone through and i just accidently collided with you and due to that frustration i started scolding you however it was totally mine fault. Now whenever i met you again or even not met you again but still if you remember that incident what you think about me, it will be decided at the later stage what kind of a person am i in my life, but you should had decided that i am a very ill mannered, illiterate fellow. So Alka is my view is that we can’t take this column in a generalistic way as in today professional world in such a chaos and so much competition no one have enough time to go in the deep to access a person. We go for a lot of meeting to close down or to take orders from the new client and many times other competitors are also for the same order and there we have to act accordingly and the customer also have to react immediately within a very short time span to whom he have to give the order or with whom he have to do the business and in that scenario he don’t have enough time, he will have to take the decision on the basis of the presentation as well as product as well as the executive which impressed him more. With due respect alka ji, i am too impressed with your blog, but unfortunately in my personal view all these things are ok on the paper but when you are in the professional world you have to think in other way to sustain yourself in this corporate world.

    alkargupta1 के द्वारा
    June 27, 2012

    Tiwari ji First of all I welcome you on my blog. Thanks for your response to my article. Although we have never read your comments in past. Once again thanks to your open views. I am much better in Hindi writing than English. So please forgive me for my writing mistakes. In my opinion “First Impression” should never be a lasting impression although it may have deep impression in our mind and heart. We must always try to analyze the situation and think before we firm up the opinion. And that is how we maintain a long lasting relationship. What you have written is true for professional word.We can not see the inner profile of the person in one or two meetings and when it comes for decision making, one will have to proceed spontaneously if it is a call of the time. But my article more talks about the artificial and inner profile of a person. One should always try to carry single profile with out any makeup / false ceiling and that is what our all true religious preacher do. This article was a spontaneous out come what I saw in my house which is under construction. In other worlds if one carry two profile in his / her family or society may not be a respected person in his/her family due to mismatch in behavior at various occasions. Hope I tried to answer you to best of my understanding and ability. Regards, Alka

ajaykr के द्वारा
June 26, 2012

आपका लेख बहुत अच्छा हैं ….और चिर स्थायी बात आपने कही है,आपको बधाई … …

    alkargupta1 के द्वारा
    June 27, 2012

    अजय जी , आपको लेख बहुत अच्छा लगा जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई लेख को समय दिया और अपने विचारों से अवगत कराया हार्दिक धन्यवाद

seemakanwal के द्वारा
June 24, 2012

प्रिय अलका जी हमें अपने चारो ओर बहुत तरह के लोग मिलतें हैं पहले तो खूबसूरती देख कर हम आकर्षित हो जातें हैं ,वास्तविकता तो बाद में पता चलती है ….

    alkargupta1 के द्वारा
    June 24, 2012

    सीमा जी , सर्वप्रथम तो ब्लॉग पर आपका स्वागत है….. निसंदेह हम पहले वाह्य खूबसूरती की ओर आकर्षित होते हैं लेकिन यह आकर्षण मात्र अस्थायी ही हो पाता है और आतंरिक अवगुणों (वास्तविकता) के पता चलते ही उसकी वाह्य खूबसूरती भी नगण्य हो जाती है फिर मुझे लगता है दीर्घकालीन मधुर संबंधों के लिए तो वाह्य सुन्दरता के साथ-साथ आतंरिक सुन्दरता भी आवश्यक है……. साभार

jyotsnasingh के द्वारा
June 23, 2012

प्रिय अलका जी, मानव प्रकृति ही ऐसी है की वो सुन्दरता को देखना और सराहना चाहती है और हर सुंदर चीज़ पर अपना आधिपत्य भी जमाना चाहती है और इसी वजह से कई बार विनाश भी होता आया है,आप सही कहती हैं की महतवपूर्ण होने से अच्छा होना बेहतर है लेकिन अगर कोई महत्व पूर्ण के साथ साथ सुंदर भी हो जाए तो क्या हर्ज़ है वैसे भी हम पहला महत्व तो सुन्दरता देख कर ही देते है बाकि तो बरतने पर ही पता चलता है. ज्योत्स्ना.

    alkargupta1 के द्वारा
    June 24, 2012

    ज्योत्सना जी , आपने रचना पर अपने विचारों से अवगत कराया बहुत अच्छा लगा बिलकुल सही कहा आपने अगर कोई महत्त्वपूर्ण होने के साथ साथ सुन्दर हो जाये तो कोई भी हर्ज़ नहीं है बल्कि सोने में सुहागा होगा….. बहुत ही सारगर्भित प्रतिक्रिया हेतु आपका आभार

minujha के द्वारा
June 22, 2012

बहुत दिनों बाद इतने सारगर्भित आलेख के साथ आपकी वापसी निसंदेह प्रशंसनीय है,बहुत ही अच्छा लिखा है आपने

    alkargupta1 के द्वारा
    June 22, 2012

    मीनू जी , हार्दिक धन्यवाद

rekhafbd के द्वारा
June 21, 2012

अलका जी ,सादर ,सबसे पहले अच्छे आलेख पर मेरी बधाई स्वीकार करें ,ऐसा आलेख तो कभी कभी ही पढने को मिलता है ,लिखती रहें ,शुभकामनाएं

    alkargupta1 के द्वारा
    June 21, 2012

    रेखा जी , आपकी प्रतिक्रियाएं बहुत उत्साहवर्धन करती हैं….. इस लेख पर आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर अच्छा लगा और मुझे मनोबल मिला…. हार्दिक धन्यवाद

June 20, 2012

सादर प्रणाम! पूरा बकवास लिखा है आपने सिवाय …….‘ महत्त्वपूर्ण होना अच्छा है , किन्तु अच्छा होना अधिक महत्त्वपूर्ण है |’

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    हर किसी का दृष्टिकोण अलग-अलग होता है… खिड़की से बाहर देखने पर किसी को पत्थर और बजरी दिखाई देती है और किसी को कीमती मोती…… आपके महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण के लिए धन्यवाद

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    पूरा बकवास बताने के लिए भी धन्यवाद

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय अलका जी इस मंच की सन्मानित लेखिका है आपको अपनी भाषा शैली सुधारनी चाहिए बताने का कष्ट करेंगे की इन्होने क्या गलत लिखा है ? उम्मीद है की आप आगे से ऐसी बचकानी हरकत नहीं करेंगे ….

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    राजकमल जी , सहयोग के लिए हार्दिक धन्यवाद

    June 21, 2012

    भैया, सम्मानित होने का मतलब यह नहीं कि कोई व्यक्ति सही हो…यदि सम्मान लोगो द्वारा दिया हुआ है तो स्वाभाविक सी बात है कि उसे लिया भी जा सकता है जबकि सच्चाई यह है कि सम्मान न लेने कि चीज है और न देने की…………..छोडिये इन सब बातों को अब मुद्दे की बात करते हैं……… ______________________________________________________________________ “यहाँ हम यह कह सकते हैं कि यदि हमारा व्यक्तित्त्व आतंरिक रूप से व्यवस्थित हैं, दृढ- प्रतिज्ञ और हृदय से शुद्ध हैं ,व्यवहार में कोई भी कृत्रिमता नहीं हैं तो हम लोगों को प्रभावित कर सकते हैं व प्रगाढ़ तथा मधुर सम्बन्ध भी बना सकते हैं और यदि हमारा व्यक्तित्त्व आतंरिक रूप से अव्यवस्थित है.मन में कोई भी दुराव-छिपाव या छल-कपट है और अपने व्यवहार में कृत्रिमता है तो लोगों को प्रभावित करने का या फिर सम्बन्ध बनाने का प्रयास करें तो अत्यल्प समय के लिए ही सफलता मिल सकती है लेकिन जब हमारा रहस्य खुल जाता है तो स्थिति देखते ही बनती है और तुरंत ही उस स्थिति से पलायन करना चाहते हैं … ” इनके आलेख का आस्जय यह है कि हमारा व्यक्तित्त्व आतंरिक रूप से व्यवस्थित हैं, दृढ- प्रतिज्ञ और हृदय से शुद्ध, सफलता और दूसरों को प्रभावित करने के लिए होना चाहिए…….कुछ अटपटा आपको नहीं लगा…….! _______________________________________________________________________ इन्होने दो गुणों को अलग करने कि जगह पर पुरे आलेख में पुरे मानव समाज को दो वर्गों में बाट दिया. जबकि हकीकत यह है कि यह रूप हरेक व्यक्ति में उपस्थित है. अब व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह किस रूप को कितना अपने आचरण में लता है………….. _______________________________________________________________________ आप एक बार पुनः इस आलेख को ध्यान से पढ़े तो पता लगेगा कि यह कुछ बचकानी सी सोच है………..मैं भी ५-१० साल पाहिले कुछ ऐसा ही सोचता था………………..कमाल है हम प्राकृतिक और कत्रिम की बात करते हैं और अगले ही पल कहते हैं कि हमें दृढ- प्रतिज्ञ और हृदय से शुद्ध लोगो को प्रभावित और सफलता करने के लिए करना चाहिए……………और यह भाव इनके पुरे आलेख में दिखा है……………………..

    June 21, 2012

    सबसे बड़ी बात कि इस आलेख में यह अपने विषय-वस्तु से पूर्णता भटक गयी हैं………….मानव प्रकृति और फाल्स सीलिंग….की बात की बजाय कुछ और ही राग अलाप रही हैं………यहाँ इन दोनों की तुलना करने की बजाय मानव-मानव की तुलना शुरू कर दी हैं…….ऊपर से ….प्रभावित और सफलता……………! दोष न इनका है और न मेरा…………वही मानव स्वभाव…………….

    alkargupta1 के द्वारा
    June 21, 2012

    महानुभाव , आपने इस लेख को पुनः अपना अमूल्य समय दिया अपने विश्लेष्णात्मक विचारों से मुझे और श्री राजकमल जी को अवगत कराया उसके लिए कोटिशः आभार ! आप जैसे विश्लेषक भी इस मंच पर अति आवश्यक हैं……..हिंदी साहित्य के महान कवि कबीर दास जी के निम्न लिखित दोहे से यह पूर्ण रूपेण चरितार्थ है…… निंदक नियारे राखिये , आँगन कुटी छवाय| बिन पाणी बिन सबुना , निर्मल करै सुभाय ||

sadhanathakur के द्वारा
June 20, 2012

भाभी जी ,प्रणाम ..बहुत मुद्दत बाद मंच पर आपको पाकर बहुत अच्छा लगा ,बहुत ही सार्थक लेख ………

    alkargupta1 के द्वारा
    June 21, 2012

    प्रिय साधना , तुम्हें लेख सार्थक लगा जानकार प्रसन्नता हुई….. आजकल कहाँ रहती हो…….

vinitashukla के द्वारा
June 20, 2012

फाल्स सीलिंग और कृत्रिम व्यवहार की सुन्दर तुलना अलका जी. लम्बे समय के बाद आपकी रचना पढकर अच्छा लगा.

    alkargupta1 के द्वारा
    June 21, 2012

    विनीता जी . आपकी प्रतिक्रियाएं सदैव ही प्रोत्साहन भरी होती हैं लेख को समय देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

arun sathi के द्वारा
June 20, 2012

सुन्दर ..

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    ब्लॉग पर स्वागत है रचना पढने के लिए धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
June 20, 2012

सुन्दर उपमा के साथ व्यवहारिक व सार्थक सन्देश अलका जी

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    हार्दिक धन्यवाद निशा जी

Mohinder Kumar के द्वारा
June 20, 2012

अल्का जी, बहुत अच्छा लगा जो सब पचडों से निबटारा कर आप मंच पर फ़िर से अवतरित हुई हैं. आपने फ़ाल्स सीलिंग और मानवीय प्रकृति की खूबसूरती से तुलना की है. कितना अच्छा होता यदि हम हमेशा के लिये कोई फ़ाल्स सीलिंग लगा कर अपने अतीत के कडवे पलों को हमेशा के लिये छूपा पाते या हसीन पलों को और हसीन कर पाते… पर मानव का मास्तिष्क कुछ ऐसा है कि जो भूलना चाहो उसे हमेशा याद रखता है और जो याद रखना चाहो उसे हमेशा भूल जाता है… मनोभावों को साझा करने के लिये आभार.

    alkargupta1 के द्वारा
    June 22, 2012

    मोहिंदर जी , आपकी पहली पंक्ति पढ़ कर मुझे बहुत हंसी आई… अब क्या करें मोहिंदर जी ये जो जीवन है न उसके साथ हर रोंज ही कुछा न कुछ पचड़ा लगा ही रहता ही और उससे निपटाना भी आवश्यक है अन्यथा हम उन्हीं में ही उलझे रहेंगे इसलिए उन्हें जल्दी से निपटाया और मंच पर आप सबसे मिलने के लिए आ पहुंची….इस रचना पर विचारों से अवगत करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 20, 2012

आदरणीय अलका जी, सादर प्रसन्नता है आपकी उपस्थिति को लेकर . बहुत सुन्दर विषय प्रस्तुत किया है. सहमत

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    कुशवाह जी , आपकी सहमति के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ

meenakshi के द्वारा
June 20, 2012

अलका जी, परसों रात जब मैंने आपका लेख पढ़ा और कमेंट्स भी लिखे पर पता नहीं क्यों नेट..या किसी कारण से…संभव नहीं हो पाया था… आज अभी थोड़ी फुर्सत मिली तो….बुद्धिमान लोगों की ये खासियत होती है…वो कहीं .. भी कुछ.. ढूंढ लेतें हैं…” फाल्स-सीलिंग ” को इंसानी जीवन से जोड़ते हुए क्या.. सटीक प्रस्तुति की है ! अंतिम कुछ पंक्तियों से लेख …बहुत अच्छा बन गया है… बहुत-२ बधाई . मीनाक्षी श्रीवास्तव

    alkargupta1 के द्वारा
    June 22, 2012

    मीनाक्षी जी , ये कमेन्ट तो एक बार सबमिट करने पर जाते ही नहीं और जब जाते नहीं साथ में लिखा हुआ भी सब कुछ डिलीट हो जाता है अब फिर से लिखना पड़ता है और दूसरे नेट की समस्या भी चलिए कोई बात नहीं इन सबके रहते भी हम लोग अपना कार्य बराबर करते रहते हैं…..मैं बुद्धिमान तो नहीं हूँ मीनाक्षी जी लेकिन हाँ सौभाग्यवश इस मंच पर प्रबुद्ध और बुद्धिजीवियों का साथ मिल गया तो फिर बस थोडा बहुत लिखने लगी और आप सबका प्रोत्साहन मिला …… प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद

akraktale के द्वारा
June 20, 2012

अल्काजी सादर नमस्कार, आपकी सोच से पूर्ण सहमति है क्योंकि बात आपकी सोलह आने सच है. किन्तु वास्तविकता की दुनिया में इतना आसान नहीं,आप फाल्स सीलिंग कह रही है बात तो परदे की ही हुई ना! हम घरों में भी लाख कोशिश करें की कहीं कुछ अटाला ना जमा हो किन्तु वह संभव नहीं हो पाता, वही होता है चरित्र के साथ हम चाहते हैं की हमारा चरित्र पारदर्शी हो कहीं कुछ छुपा ना रहे, इस विषय पर मैंने लिखा है कभी प्रस्तुत करूंगा, किन्तु ऐसा हो नहीं पाता. ‘ महत्त्वपूर्ण होना अच्छा है , किन्तु अच्छा होना अधिक महत्त्वपूर्ण है |’ आपकी कहीं से ली गयी और दी गयी सीख से मै सहमत हूँ. मै कोई भी बात का विरोध नहीं कर रहा हूँ किन्तु बस यही सोचता हूँ की लाख चाहकर भी पूर्ण पारदर्शिता संभव है? बहुत अच्छे विषय पर लिखा चरित्र के आंकलन पर जोर देता अच्छा आलेख. बधाई.

    jlsingh के द्वारा
    June 20, 2012

    मैं भी वही बात कहना चाहता हूँ, निश्चय ही अधिकतर लोग फाल्स सीलिंग का इस्तेमाल करते हैं …. अच्छे आलेख पर बधाई !

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    अशोक जी ,आप बिलकुल सही कह रहे हैं…..परन्तु यहाँ मैं यह कहना चाहूंगी हम भरसक प्रयत्न यही करें पहले तो घर में हम अटाला जमा ही न होने दें जो उस अटाले को ढकने के लिए परदे की जरूरत पड़े……थोडा सा परिश्रम करके उन्हें घर से बाहर निकाल फेंके और बस आवश्यक वस्तुओं को ही रहने दें तब हमें परदे की जरूरत नहीं होगी अन्यथा हमारी जरूरत की चीज़ें भी उसी में कहीं छिपी रहेंगी…..और दूसरी बात शायद कोशिश करने पर कुछ भी असम्भव नहीं होता जब हमारे संकल्प और इच्छा शक्ति दृढ़ हो तथा थोडा सा परिश्रम करें … और तब हमारा चरित्र भी थोड़े से परिश्रम से पारदर्शी हो सकता है जहाँ छिपाने के लिए कुछ भी नहीं रह जाता है अपने प्रयत्न , दृढ़ संकल्प और मज़बूत इच्छा शक्ति के आधार पर अपने व्यक्तित्त्व को एक नया रूप दे सकते हैं बशर्तें हमारे व्यवहार में कोई भी कृत्रिमता न हो…..हमारा व्यवहार और व्यक्तित्त्व दोनों ही पारदर्शी हो सकते हैं….. क्योंकि व्यवहार तथा व्यक्तित्त्व में कृत्रिमता नहीं है तो हमारा चरित्र भी उन्हीं के साथ स्वयं ही पारदर्शी हो जाता है …….. हाँ वास्तविकता की दुनिया में यह कार्य थोडा कठिन अवश्य हो सकता है पर असंभव नहीं…….. विचारों से अवगत करने के लिए हार्दिक धन्यवाद

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    सिंह साहब , आपकी बात में कोई भी दो राय नहीं है…..लेकिन जब इनकी वास्तविकता सामने आती है तो यह अपने को किसी तरह नहीं बचा पाते हैं बस थोड़े ही दिन यह फाल्स सीलिंग काम करती है……… प्रतिक्रिया हेतु आभार

pritish1 के द्वारा
June 20, 2012

अलका जी आपने सत्य कहा……..कितु वर्त्तमान समय मैं प्रत्येक व्यक्ति स्वार्थी है…….आज मैं यहाँ उपस्थित हूँ तो अपने शब्द प्रेम के स्वार्थ के लिए, आपके शब्दों से कुछ सिख सकूँ अर्थार्त सिखने के प्रेम के स्वार्थ के लिए…………कदाचित समय ने प्रेम को भी स्वार्थी बना दिया है………………..

    alkargupta1 के द्वारा
    June 22, 2012

    प्रीतिश जी , आप ब्लॉग पर आये और लेख को समय दिया तथा अपने विचारों से अवगत कराया ….प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद

chaatak के द्वारा
June 19, 2012

आदरणीय अलका जी, सादर अभिवादन, इस पोस्ट को पढने के बाद ऐसा लगा जैसे हर इंसान के ऊपर एक फाल्स क्रेस्ट होती है और अक्सर वह स्वयं इसे ही अपनी वास्तविकता मान बैठता है| अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    चातक जी , बहुत दिनों बाद आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर अच्छा लगा विचारों से अवगत करने उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक धन्यवाद

R K KHURANA के द्वारा
June 19, 2012

प्रिय अलका जी, “महत्त्वपूर्ण होना अच्छा है , किन्तु अच्छा होना अधिक महत्त्वपूर्ण है |’ बहुत दिनों के बाद आपकी रचना पढने को मिली ! लेकिन बहुत ही सारगर्भित और सुंदर रचना है ! अगर मनुष्य बाहर से और भीतर से एक जैसा हो जाय तो क्या कहना ! परन्तु आज की दुनिया में ऐसा होता नहीं है ! अच्छी रचना के लिए बधाई ! राम कृष्ण खुराना

    alkargupta1 के द्वारा
    June 21, 2012

    आदरणीय खुराना जी , सादर अभिवादन एक लम्बे अन्तराल पर आपकी प्रतिक्रिया पाकर बहुत ही सुखद अनुभूति हुई…… जी हाँ आज की दुनिया में ऐसा नहीं होता मुझे लगता है कि आज मनुष्य भौतिक जगत की चकाचौंध से इतना अधिक प्रभावित हो गया है कि जगह -जगह उसे अपने व्यवहार और व्यक्तित्त्व को कृत्रिमता का जामा पहनाना पड़ता है…… प्रतिक्रिया हेतु आपके प्रति आभार व्यक्त करती हूँ….

yogi sarswat के द्वारा
June 19, 2012

तो फिर क्यों न हम अच्छा होने का महत्त्व समझें तांकि जीवन की दीर्घकालीन सफलता प्राप्त कर सकें……! कहते है कि जीव को मानव योनी केवल एक बार ही मिलती है फिर क्यों न हम इस संसार में सम्मानपूर्वक जीयें और सम्मानपूर्वक जीने के लिए हमें वही होना चाहिए जो हम दिखाई दें……! आदरणीय अलका जी सादर नमस्कार ! मुझे लगता है की हर इंसान अपने आप को सही समझता है , वो सब कुछ यहीं , इसी माहौल में आकर सीखता है ! एक अंग्रेजी की कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आती है -ये दुनिया कितनी अच्छी है , ये स्वर्ग भी है , ये नरक भी है ! मगर हमें ये देखना होगा की हमारी नज़र कैसी है ! बहुत सुन्दर लेखन

    alkargupta1 के द्वारा
    June 21, 2012

    जी हाँ योगी जी बिलकुल सही कहा कि कोई भी व्यक्ति अपने आप को गलत साबित नहीं करना चाहता क्योंकि वह अपनी दृष्टि से बिलकुल सही है दूसरे की दृष्टि में वह क्या है इसे समझ कर भी समझना ही नहीं चाहता क्योंकि उसका सोचने व समझने का दायरा बहुत ही संकुचित होता है………प्रतिक्रिया की अंतिम पंक्तियाँ बहुत ही प्रभावी हैं…….. सादर आभार

vikramjitsingh के द्वारा
June 19, 2012

आदरणीया अलका जी….सादर नमस्कार…. बहुत गहन चिंतन किया है आपने…..मानव प्रकृति का… कहना पड़ेगा…..ये आप की सर्वश्रेष्ट कृति है…. सादर……

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    विक्रमजीत जी , अगर यह कृति आपको अच्छी लगी तो मेरा लिखना सार्थक रहा…..प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
June 19, 2012

आदरणीया अलका जी,सादर.बहुत अच्छे विषय को छुआ है आपने.मानव व्यवहार की तुलना फाल्स सीलिंग से अनोखा है.यह सही है कि एक व्यक्ति के पीछे छिपे हुए कई चेहरे होते हैं,विभिन्न अवसरों और विभिन्न भूमिकाओं में एक ही व्यक्ति के कई चेहरे दिखाई देते हैं.एक गाना भी सुना था,लता जी का…..एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग. आपका कहना बिलकुल सही है कि”यदि हमारा व्यक्तित्त्व आतंरिक रूप से व्यवस्थित हैं, दृढ- प्रतिज्ञ और हृदय से शुद्ध हैं ,व्यवहार में कोई भी कृत्रिमता नहीं हैं तो हम लोगों को प्रभावित कर सकते हैं व प्रगाढ़ तथा मधुर सम्बन्ध भी बना सकते हैं और यदि हमारा व्यक्तित्त्व आतंरिक रूप से अव्यवस्थित है.मन में कोई भी दुराव-छिपाव या छल-कपट है और अपने व्यवहार में कृत्रिमता है तो लोगों को प्रभावित करने का या फिर सम्बन्ध बनाने का प्रयास करें तो अत्यल्प समय के लिए ही सफलता मिल सकती है.”

    alkargupta1 के द्वारा
    June 21, 2012

    जी हाँ राजीव जी आपने बहुत सही कहा किविभिन्न अवसरों पर एक ही व्यक्ति के कई कई चहरे भी होते हैं उनके पीछे उसका वास्तविक चेहरा छिपा ही रहता है औत सामने वाला व्यक्ति कृत्रिम चेहरों की आड़ में उससे धोखा खा जाता है….. वैचारिक समर्थन हेतु हार्दिक आभार

चन्दन राय के द्वारा
June 19, 2012

अलका जी , सर्वप्रथम आपको बड़े दिवस बाद मंच पर इक बेहतरीन कृति के साथ देख अच्छा लगा , आचरण का दोहरापन किसी भी मनुष्य के लिए स्वय के लिए हानिकारक है , सायद अच्छा बनना कठिन हो ,पर अच्छे व्यवहार की जो आत्मिक संतुष्टि मिलती है ,वह मन को इक चिरकालीन तृप्ति देती है , और सायद उसका अच्छापण ही उसे बुरे समय में हर संकट से उबारता भी है , बहुत ही बेहतरीन विचार है आपके !

    alkargupta1 के द्वारा
    June 21, 2012

    चन्दन जी , इस लेख पर आपके विचार पढ़ कर बहुत प्रसन्नता हुई मैं इस लेख के माध्यम से जो कुछ भी कहना चाहती थी उसे आपने अपने शब्दों मैं बखूबी व्यक्त कर दिया लेख के मर्म को समझ कर बहुत ही सुन्दर शब्दों में प्रतिक्रिया दी….. हार्दिक आभार

rajkamal के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय अलका जी ….. सादर प्रणाम ! इस तरह की रचना कोई महिला ही पेश कर सकती है किसी पुरुष के बस की बात नहीं है यह ….. सच में ही भावों का अद्भुत वरदान दिया है प्रकर्ति ने नारियों को ….. और आप तो एक विदुषी और सज्जन महिला है इसीलिए यह लेख इतना निखरकर सामने आया है मुबारकबाद http://rpraturi.jagranjunction.com/2012/06/18/%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%81-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%80/ :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) जय श्री कृष्ण जी

    alkargupta1 के द्वारा
    June 21, 2012

    राजकमल जी , आपके शब्दों का बहुत आदर करती हूँ….लेकिन आप इतनी भी अधिक प्रशंसा मत कीजिए ……मैं तो कुछ भी नहीं हूँ….. मन में जो भी भाव उठते हैं अपनी भाषा में आप सबके समक्ष प्रस्तुत कर देती हूँ आप सबके स्नेह और सहयोग के वशीभूत ही कुछ भी थोडा बहुत लिख लेती हूँ बस इससे अधिक और कुछ भी नहीं…आपकी सद्भावनाओं के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ !

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
June 18, 2012

‘ महत्त्वपूर्ण होना अच्छा है , किन्तु अच्छा होना अधिक महत्त्वपूर्ण है |’ तो फिर क्यों न हम अच्छा होने का महत्त्व समझें तांकि जीवन की दीर्घकालीन सफलता प्राप्त कर सकें…… आदरणीया अलका जी कुछ हटकर आया आप का ये तुलनात्मक लेख ज्ञान भरा और उपयोगी रहा …बिलकुल सच है ये फाल्स सीलिंग को बहुत ही धैर्य के साथ मजबूती से गढ़ा गया हो तो ही काम आता है नहीं तो कुछ कोमल जल की बूँदें भी सब पर्दा फाश कर जाती हैं ढहा जाती हैं निम्न उक्ति सटीक है ….सुन्दर … यदि हमारा व्यक्तित्त्व आतंरिक रूप से व्यवस्थित हैं, दृढ- प्रतिज्ञ और हृदय से शुद्ध हैं ,व्यवहार में कोई भी कृत्रिमता नहीं हैं तो हम लोगों को प्रभावित कर सकते हैं व प्रगाढ़ तथा मधुर सम्बन्ध भी बना सकते हैं भ्रमर ५

    alkargupta1 के द्वारा
    June 21, 2012

    शुक्ला जी , इस फाल्स सीलिंग को देख कर मस्तिष्क में विचारों की कुछ तरंगें उठने लगीं और जब कुछ चिंतन किया तो वे विचार शब्द रूप में परिणित हुए और यहाँ मंच पर प्रस्तुत कर दिया…..लेख के सार को समझ कर आपने बहुत अच्छा विश्लेषण किया….. मेरा इसे लिखने का यही उद्देश्य था आपकी सार्थक प्रतिक्रिया हेतु सादर आभार

rita singh 'sarjana' के द्वारा
June 18, 2012

अलका जी ,नमस्कार , फाल्स सीलिंग से उपजी मानव भावना को उजागर करती सुन्दर आलेख के लिए बधाई , सही कहा -”तो फिर क्यों न हम अच्छा होने का महत्त्व समझें तांकि जीवन की दीर्घकालीन सफलता प्राप्त कर सकें……! कहते है कि जीव को मानव योनी केवल एक बार ही मिलती है फिर क्यों न हम इस संसार में सम्मानपूर्वक जीयें और सम्मानपूर्वक जीने के लिए हमें वही होना चाहिए जो हम दिखाई दें……!”

    alkargupta1 के द्वारा
    June 21, 2012

    रीता जी , आपको लेख का यह अंश पसंद आया बहुत ख़ुशी हुई लेखनी को थोडा बल मिला आप तो अपने मनोभावों को स्वयं ही कितनी सुन्दरता से वर्णित करती हैं आपकी रचनाएँ पढ़कर बहुत अच्छा लगता है ….प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद

dineshaastik के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय अलका जी सादर नमस्कार। मानवीय  व्यवहार का छत  से बहुत  ही सटीक  एवं तुलनात्मक   विश्लेषण……..

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    दिनेश जी . प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद

roshni के द्वारा
June 18, 2012

अलका जी नमस्कार बहुत बढ़िया आलेख … फाल्स सेल्लिंग से उपजे विचार मानव सवभाव को व्यक्त कर गए … और ये लाइन महत्त्वपूर्ण होना अच्छा है , किन्तु अच्छा होना अधिक महत्त्वपूर्ण है |’बहुत अच्छी लगी .. ऐसे ही अपने सुंदर विचारों से रोशन करते रहिये आभार

    alkargupta1 के द्वारा
    June 21, 2012

    रोशनी जी , बहुत दिनों बाद आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर सुखद अनुभूति हुई हौसला अफज़ाई के लिए हार्दिक आभार

yamunapathak के द्वारा
June 18, 2012

आपको आपके कई ब्लॉग में याद किया आज आपके अनुपस्थित होने की वज़ह पता चली. यह ब्लॉग बेहतरीन है खासकर अंतिम पंक्तियाँ अछा होना महत्वपर्ण है.ये बड़ी बात है क्योंकि अछे लोग किसी भी परिस्थिति में अछे ही रहते हैं ठीक चन्दन की तरह. शुरुआत फालसे सीलिंग से भली लगी. नमस्कार अल्काजी.

    alkargupta1 के द्वारा
    June 21, 2012

    बस यमुना जी ये ही सब कारण थे जिनकी वजह से आपसे कोई भी वैचारिक संपर्क भी नहीं हो पाया……बहुत अच्छी बात कही आपने कि अच्छे लोग हर परिस्थिति में अच्छे ही होते हैं……. अपना अमूल्य समय देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

Santosh Kumar के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय माताश्री ,.सादर प्रणाम कई दिनों बाद मंच पार आपकी वैचारिक वापसी बहुत अच्छी लगी ,.. अत्यंत शिक्षाप्रद लेख के लिए कोटिशः आभार आपका ,..फ़ाल्स सीलिंग के साथ मानव व्यवहार की तुलनात्मक विवेचना वास्तव में सच्चाई के बहुत करीब है ,.फिर भी कुछ असंगत सा लगता है ,..अच्छा लगने और अच्छा होने में अंतर है ,.जिस तरह से अन्दर और बाहर एक होना मानव के लिए जरा कठिन है, इसके लिए संयम के साथ परिश्रम की जरूरत है ,..उसी तरह से कृत्रिम व्यवहार सिर्फ एक विक्रेता या लोलुप ही करता है ,…हम अपना समाधान अपना समझने वालों से मांगते भी हैं और अपने सुविधानुसार ही पाना चाहते हैं ,…यह नहीं हो पाने की स्थिति में आतंरिक अशांति और बढ़ती है ,… हम किसी के अनुसार खुद को दिखाने के चक्कर में सहज प्रवाह में व्यवधान पैदा कर लेते हैं ,…इस व्यवधान से हमारा दोगलापन और ज्यादा बढ़ जाता है ,…आज मेरी बात एक बुद्धिमान व्यक्ति से हुई ,.उनके अनुसार जो स्वयं अशांत है वो कभी शान्ति नहीं ला सकता है ,..और खुद की शान्ति जाग्रत चेतना से लायी जा सकती है ,..आज का दिन वास्तव में बहुत अच्छा है ,..बहुत गहरी और सार्थक सीख देते लेख के लिए कोटिशः नमन ..सादर

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    प्रिय संतोष जी , हर चीज़ के दो पहलू होते हैं और दोनों ही एक दूसरे से जुड़े हुए हैं एक अकेला कुछ नहीं कर सकता उसका कोई महत्त्व भी नहीं है उसका कोई अस्तित्त्व भी नहीं है…… अच्छा होने में आतंरिक वास्तविकता दृष्टिगत होती है और अच्छा लगने के लिए वाह्य तरीकों को अपनाया जाता है…जहाँ कुछ संगत है वहां असंगत भी होता है इसे नकारा नहीं जा सकता ….जिसके व्यवहार में कृत्रिमता नहीं होती है उसी को हम अपना समझते हैं…..साथ ही अल्प समय की अपेक्षा दीर्घकाल में वही सफल होता देखा गया है…..विस्तृत और सटीक प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद

vasudev tripathi के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय अलका जी, यह सही है कि मनुष्य कृतिम व्यक्तित्व के भी देखने को मिलते हैं और सरल भी किन्तु जिस तरह आज बदलती संस्कृति व हावी होते भोगवाद ने वास्तविकता को छद्म स्वरुप की आड़ में ढँक दिया है उससे कहीं न कहीं व्यक्ति स्वयं भी अपनी वास्तविकता को खोता जा रहा है..!! दिल्ली मुंबई जैसे मेट्रो शहरों में तो कम से कम ऐसा ही है और यह तेजी से छोटे शहरों की और भी बढ़ रहा है!! अच्छा चिंतनपूर्ण लेख!

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    वासुदेव जी , आपके लेखों की भांति आपकी प्रतिक्रियाएं भी अर्थपूर्ण व गहन भाव तथा विचारणीय होती हैं…रचना पर अपने महत्त्वपूर्ण विचार रखने के लिए हार्दिक आभार

allrounder के द्वारा
June 18, 2012

सादर नमस्कार आदरणीय अलका जी, बहुत ही गहन आंकलन किया है अपने आलेख के द्वारा मानवीय व्यवहार का और उसके महत्त्व का, सचमुच हम लोग जीवन मैं अच्छे और बुरे हर किस्म के लोगों से मिलते हैं, और ये छत रूपी आवरण अक्सर हमें मनुष्यों की सही पहचान करने मैं बाधक होता है ! एक अच्छे वैचारिक पोस्ट पर हार्दिक बधाई आपको !

    alkargupta1 के द्वारा
    June 20, 2012

    सचिन जी , आपके शब्दों से बहुत मनोबल बढ़ा….. इस रचना पर आपकी सकारात्मक व सारगर्भित प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार


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