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क्या अनमोल उपहार यही (कांटेस्ट)

Posted On: 27 Jan, 2014 Others,कविता,Others में

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नाम है पर्यावरण मेरा
आंदोलित हो रहा मन मेरा
प्रकृति को निहार-निहार
हिलोरें ले रहा मन मेरा |
—————————————
मन में उठी तरंगें ऐसे
बजने लगा हो कोई साज़ जैसे
अमूल्य निधि हो जीवन की
है प्रकृति का अनमोल उपहार यही !
————————————–
विचारों की निर्झरिणी में लगाई एक डुबकी
बाहर निकले तो लगायी जोर की सुबकी |
सर्वतः फैल रहा कैसा यह प्रदूषण
दूषण ने किया दूषित पर्यावरण |
—————————————-
खरों ने किया खारित मृदु वारि
दरख्तों में लगा कोई घात भारी
झूल रही थीं लताएँ हमारी
सघन वन में कभी |
—————————————
मुँह खोले राक्षस खड़ा है यहाँ
जैसे ही वाहनों ने लिया स्टार्ट
निकल पड़ा धूम राक्षस स्मार्ट
हुआ प्रदूषित मैं अकस्मात !
————————————–
अरे ! कैसा यह प्रदूषण ?
सोचा भी न था
होंगे यहाँ भी खर ,दूषण !
—————————————-
ये तरु-पल्लव लताएँ सारे
कर रहे काना-फूसी सारी रातें
हैं ये तो आपस की बातें
कौन जाने यहाँ हमारी मारें !
——————————————
खड़ा हुआ कर जोड़ सामने तुम्हारे
न करो शोषण अब जीवन का मेरे
क्या अंत नहीं शोषण का मेरे ?
क्या यही प्रकृति का उपहार मुझे ?
—————————————-
मन में है अब अरमान यही
कर दूँ आवृत स्वावरण से जग सारा
मेरे ही आवरण से हों वरणीय कुञ्ज सारे
वास करते हों नभ-प्राणी उसमें सारे !
ऐसा रहूँ , पर्यावरण नाम मेरा !!
————-*********————



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

meenakshi के द्वारा
March 26, 2014

प्रदूषण पर इतनी सुन्दर रचना कि – मेरा मन प्रफुल्लित हो गया . सुन्दर शब्दों का संयोजन और लयबद्धता कमाल… बहुत -२ शुभकामनाएं अलका जी !

    alkargupta1 के द्वारा
    April 4, 2014

    रचना पढ़ कर आपका मन प्रफुल्लित हुआ मेरी रचना भी सार्थक हो गयी मीनाक्षी जी आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार

Ramesh Bajpai के द्वारा
March 23, 2014

मन में उठी तरंगें ऐसे बजने लगा हो कोई साज़ जैसे अमूल्य निधि हो जीवन की है प्रकृति का अनमोल उपहार यही ! आदरणीया बहन अलका जी कल्पनाओ में कविता प्रकृति की अनुपम भेट को संजोये रखना चाहती है | यह संदेस हर उस व्यक्ति तक पहुचना चाहिए जो धरती को प्रदूषित करने में भागीदारी निभा रहे है | बधाई

    alkargupta1 के द्वारा
    April 4, 2014

    आदरणीय रमेश भाई जी , सादर अभिवादन काश आपकी बात को पंख लग जाते और धरती को प्रदूषित करने की भागीदारी निभाने वाले लोगों के पास पहुँच जाती ……अर्थपूर्ण प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार भाई जी

jlsingh के द्वारा
January 30, 2014

प्रदूषण फैलाते कारखाने, कोई इसकी भी तो माने. देता यह जन को रोजगार, खाते पसीने का आहार! अगर जगह हो कुछ खाली, लाएं उसमे हम हरियाली. गर गाड़ी कम चलाएंगे, पर्यावरण बचा हम पाएंगे , होगी सड़कों पर भीड़ नहीं, ईंधन की होगी नहीं कमी. आदरणीया, कुछ पंक्तियाँ मेरी भी,.. आपको समर्पित!

    alkargupta1 के द्वारा
    April 4, 2014

    आदरणीय सिंह साहब , आपकी पंक्तियों ने इस रचना के सौंदर्य मैं चार चाँद लगा दिए हार्दिक आभार

yogi sarswat के द्वारा
January 30, 2014

विचारों की निर्झरिणी में लगाई एक डुबकी बाहर निकले तो लगायी जोर की सुबकी | सर्वतः फैल रहा कैसा यह प्रदूषण दूषण ने किया दूषित पर्यावरण | —————————————- खरों ने किया खारित मृदु वारि दरख्तों में लगा कोई घात भारी झूल रही थीं लताएँ हमारी सघन वन में कभी | सुन्दर शब्द आदरणीय अलका गुप्ता जी !

    alkargupta1 के द्वारा
    January 30, 2014

    हार्दिक आभार योगी जी

nishamittal के द्वारा
January 28, 2014

अति सुन्दर विचार पूर्ण रचना पर्यावरण पर. बधाई अलका जी

    alkargupta1 के द्वारा
    January 30, 2014

    हार्दिक धन्यवाद निशाजी

Santlal Karun के द्वारा
January 27, 2014

आदरणीया अलका जी, आप ने पर्यावरण जैसे विषय पर पठनीय कवितात्मक चिंतन प्रस्तुत किया है; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    alkargupta1 के द्वारा
    January 30, 2014

    रचना पर व्यक्त आपके शब्दों को पढ़कर सुखद अनुभूति हुई आदरणीय संत लाल जी हार्दिक आभार

January 27, 2014

sundar abhivyakti .badhai

    alkargupta1 के द्वारा
    January 30, 2014

    हार्दिक धन्यवाद


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