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मानुषिकता के अरण्य में (कांटेस्ट)

Posted On: 30 Jan, 2014 Others,कविता,Contest में

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भावनाओं के भव सागर में सभी कुछ कहीं खो सा गया है,
समय……वर्ष,संवत्सर ,युग बदलते दृष्टिगत हो रहे,
सभ्यता दर सभ्यता हम आगे बढ़ते जा रहे.. बढ़ते जा रहे
आदमी है कि आदमी भी अपने में खोते जा रहे खोते जा रहे |
_________________________________________

‘स्व’ का आधिपत्य हो उर पर सुसंस्कृत का लबादा चढाते,
एक दूसरे से अलग हो संस्कृति को इक अलग रूप में देखते|
आदमी यहाँ आदमियत को छोड़ मानुषिकता के अरण्य में
अत्याचार की कुल्हाड़ी ले इंसानियत के पेड़ों की जड़ें काटते |
__________________________________________

धरा पर झूठ, स्वार्थ औ ईर्ष्या का बिछौना बिछा कर,
गूंगे ,बहरे , पंगु व निष्प्राण-से ओढ़े अहम् की चादर|
मानवता के विलुप्ति-सागर में स्थान नहीं सौहार्द को ,
दुर्बुद्धि के आँगन में भागता देखता केवल अपने को |
________________________________________

ज़िन्दगी की सडकों पर बेनकाब किया अपने को,
नश्तर चुभाता भयानक सा लगता यहाँ सभी को |
प्रस्तर में न होते प्राण पर मानव में तो होते प्राण,
फिर भी आदमी हो जाता जैसे हो कोई पाषाण !

—————************————–



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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

meenakshi के द्वारा
May 29, 2014

अलका जी , “मानुषिकता के अरण्य में ” (कांटेस्ट) में वाकई आपने मानवता के बदलते रूप को बहुत खूब शब्दों में पिरो कर , लोगों को आईना दिखाने का सराहनीय प्रयास किया है . बहुत – -२ शुभकामनायें . मीनाक्षी श्रीवास्तव

Sushma Gupta के द्वारा
May 11, 2014

अलका जी , ” मनुषिकता के अरण्य में” एक बहुत ही ससक्त लेखनी से लिखी हुई यथार्थ की कसौटी पर खरी , समसामयिक प्रस्तुति है….जिसके लिए आपको हार्दिक वधाई…

    alkargupta1 के द्वारा
    May 19, 2014

    सुषमा जी , आपकी प्रोत्साहन युक्त प्रतिक्रिया से सुखद अनुभूति हुई एवम बहुत ऊर्जा मिली हार्दिक आभार

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 6, 2014

ज़िन्दगी की सडकों पर बेनकाब किया अपने को, नश्तर चुभाता भयानक सा लगता यहाँ सभी को | प्रस्तर में न होते प्राण पर मानव में तो होते प्राण, फिर भी आदमी हो जाता जैसे हो कोई पाषाण ! आदरणीया अलका जी बहुत सुन्दर शब्द-बन्ध और भाव , सुन्दर चित्रण आज के समाज और मानव का ..बधाई भ्रमर ५

    alkargupta1 के द्वारा
    May 19, 2014

    शुक्ला जी, उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक आभार

meenakshi के द्वारा
March 26, 2014

“प्रस्तर में न होते प्राण पर मानव में तो होते प्राण, फिर भी आदमी हो जाता जैसे हो कोई पाषाण !” अंतिम इन पंक्तियों में आज कि बदलती मानव की सोच उसके व्यवहार का सार झलकता है , वास्तव में आपने अलका जी बिलकुल सत्यता को अपने काव्य में उतार दिया है ,बहुत बहुत बधाई ! मीनाक्षी श्रीवास्तव

    alkargupta1 के द्वारा
    April 4, 2014

    मीनाक्षी जी , सुन्दर व अर्थपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार

Ramesh Bajpai के द्वारा
March 23, 2014

________________________________________ ज़िन्दगी की सडकों पर बेनकाब किया अपने को, नश्तर चुभाता भयानक सा लगता यहाँ सभी को | प्रस्तर में न होते प्राण पर मानव में तो होते प्राण, फिर भी आदमी हो जाता जैसे हो कोई पाषाण ! —————************————– आदरणीया अलका बहन क्या खूब लिखा है आपने ,संवेदनाओ का यह ज्वार हर इंसान के अंदर हिलोरे मारता तो आज दुनिया कुछ और ही होती | बहन बहुत बहुत बधाई |

    alkargupta1 के द्वारा
    April 4, 2014

    आदरणीय रमेश भाई जी , सादर अभिवादन आपका आशीर्वाद मिला सुखद अनुभूति हुई साभार

sanjay kumar garg के द्वारा
January 31, 2014

“ज़िन्दगी की सडकों पर बेनकाब किया अपने को” सारगर्भित सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए आभार! आदरणीय अलका जी!

    Alka Gupta के द्वारा
    January 31, 2014

    रचना पर अपने विचारों से अवगत करने हेतु हार्दिक आभार संजय जी

nishamittal के द्वारा
January 31, 2014

बहुत सुन्दर भावयुक्त रचना पर बधाई अलका जी  

    Alka Gupta के द्वारा
    January 31, 2014

    हार्दिक धन्यवाद निशाजी

jlsingh के द्वारा
January 30, 2014

प्रस्तर में न होते प्राण पर मानव में तो होते प्राण, फिर भी आदमी हो जाता जैसे हो कोई पाषाण ! आदरणीया अलका जी, सादर अभिवादन! संवेदनाएं ख़तम होती जा रही है …पर हमें अपने आपको पहचानना होगा …परिवर्तन समय की मांग है, पर मानवता के मूल्य पर नहीं, सादर!

    Alka Gupta के द्वारा
    January 31, 2014

    आदरणीय सिंह साहब , आपकी अर्थपूर्ण प्रतिक्रिया पर पूर्ण सहमति है हार्दिक आभार

yamunapathak के द्वारा
January 30, 2014

प्रस्तर में न होते प्राण पर मानव में तो होते प्राण, फिर भी आदमी हो जाता जैसे हो कोई पाषाण ! अलका जी ये बहुत विचारणीय पंक्तियाँ हैं. साभार

    Alka Gupta के द्वारा
    January 31, 2014

    वैचारिक समर्थन हेतु हार्दिक धन्यवाद यमुना जी


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