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सांकल पिया द्वार की

Posted On: 1 Aug, 2014 Others,कविता,Others में

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दुशाला ओढ़े बैठी मन के मीत में
आसमान से टूटते तारे को देखा जब
मांग उठी टूटते तारे से ……
खुल जाये सांकल पिया द्वार की
हो अद्भुत पिया मिलन भी !!!
रवि ना देना प्रचंड ऊष्म ताप
चाँद देना मन की शीतलता
कहीं शीत वायु ना चुभे गात में
बन कर कोई तीर
खोजूं रत्न सागर के अथाह जल में
गूंथ कर पिरो लूँ स्नेह सूत्र में
बंधू स्नेह पाश में !!
हो तभी अद्भुत पिया मिलन !
अद्भुत पिया मिलन !!!!



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    alkargupta1 के द्वारा
    August 5, 2014

    हार्दिक धन्यवाद योगी जी

sadguruji के द्वारा
August 2, 2014

खोजूं रत्न सागर के अथाह जल में गूंथ कर पिरो लूँ स्नेह सूत्र में बंधू स्नेह पाश में !! हो तभी अद्भुत पिया मिलन ! अद्भुत पिया मिलन !!!! बहुत भावपूर्ण और अदभुद कविता ! मन को कहीं गहरे में छू गई ! बहुत बहुत बधाई !

    ALKA GUPTA के द्वारा
    August 2, 2014

    सद्गुरु जी , कविता ने आपके हृदय की गहनता का स्पर्श किया बहुत अच्छा लगा अनुभूत्यात्मक प्रतिक्रिया से सुखद अनुभूति हुई …आगे भी प्रतीक्षा रहेगी हार्दिक आभार

Shobha के द्वारा
August 2, 2014

बड़ी ही भाव पूर्ण दिल को छू लेने वाली कविता आपकी साहित्यक गूढ़ अर्थ वाली कविता दो तीन बार पढ़ी जितनी बार पढ़ी उतने ही सुन्दर अर्थ निकले शोभा

    ALKA GUPTA के द्वारा
    August 2, 2014

    शोभाजी, सर्वप्रथम ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है रचना आपके हृदय की गहराई तक पहुँच सकी तो लेखनी को भी ऊर्जा मिली मेरे अवगत हेतु रचना को आपके विचारों की सदैव प्रतीक्षा रहेगी….. हार्दिक आभार

nishamittal के द्वारा
August 2, 2014

सुन्दर साहित्यिक रचना अलका जी बहुत सुन्दर बधाई

    ALKA GUPTA के द्वारा
    August 2, 2014

    धन्यवाद निशाजी

jlsingh के द्वारा
August 2, 2014

खोजूं रत्न सागर के अथाह जल में गूंथ कर पिरो लूँ स्नेह सूत्र में बंधू स्नेह पाश में !! हो तभी अद्भुत पिया मिलन ! अद्भुत पिया मिलन !!!! अद्भुत! सादर आदरणीया अलका जी!

    alkargupta1 के द्वारा
    August 2, 2014

    आदरणीय सिंह साहब , रचना की इन पंक्तियों ने आपके हृदय में स्थान बनाया बहुत अच्छा लगा आपकी प्रतिक्रिया से सदैव सुखद अनुभूति होती है हार्दिक आभार


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