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टूटे कलियों के अरमान

Posted On: 5 Dec, 2014 Others,social issues,कविता में

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लिए अरमानों की डोली
छोड़ बाबुल का अंगना
चली दुल्हनिया पिया संग|
रक्त बीज-सा दहेज़ दानव
खड़ा द्वारे अपने पैर पसारे|
बिका दूल्हा नीलामी लड़की की
विवाह नहीं था कोई व्यवसाय
जहाँ टूटे कलियों के अरमान
और तोड़े माँ-बापू के अरमान|
झूल गयी वो फाँसी पर
खुद आग लगाई या फिर जलाई |
अरे भारतीय युवाओं !
तुम्हारे पौरुष को धिक्कार!
खो जाओगे सभी कुछ अपना
साथ नहीं देंगे दहेज़ का टी वी
फ्रिज, आभूषण और कार
एक दिन तुम हो जाओगे बे-कार|
बेटी तो है एक धरोहर
सहेजो इन्हें अपने घर
मत तोड़ो कलियों के अरमानों को
अब तो जागो मिटा दो इस दानव को
मत करो अब कलंकित
विवाह जैसे पवित्र बंधन को
*****************



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
January 2, 2015

आदरणीया अलकारगुप्ता जी ! विचारणीय और बहुत अच्छा सन्देश देती इस रचना के सृजन के लिए बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई ! नववर्ष 2015 आपके और आपके समस्त परिवार के लिए मंगलमय हो ! नववर्ष में भी आपकी सार्थक और महत्वपूर्ण वैचारिक उपस्थिति इस मंच पर बनी रहे !

    alkargupta1 के द्वारा
    January 10, 2015

    आदरणीय सद्गुरु जी , रचना पर वैचारिक समर्थन हेतु हृदय तल से आभार मेरी और से आपको भी सपरिवार नव वर्ष की हार्दिक मंगलकामनाएं मेरा भरसक पर्यटन रहेगा किइस मंच पर मैं आप सभी के साथ अपने िचरों और भावनाओं को सजह करती रहूँ साभार

nishamittal के द्वारा
December 6, 2014

बहुत सुन्दर सार्थक रचना समाज के वीभत्स कोढ़ पर

    alkargupta1 के द्वारा
    December 6, 2014

    हार्दिक आभार निशाजी

Madan Mohan saxena के द्वारा
December 5, 2014

वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति कभी यहाँ भी पधारें

    alkargupta1 के द्वारा
    December 6, 2014

    हार्दिक धन्यवाद सक्सेना जी


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